मेरा यह लेख १९ अगस्त १९९३ को नई दिल्ली से प्रकाशित नवभारत टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था.
लंदन के जिस होटल में हम ठहरे थे, वहाँ सुबह का नाश्ता परोसने वाले चुस्त-दुरुस्त युवक-युवतियों में से एक युवक हमारे पास आकर हमसे हिंदी में बतियाने लगा. युवक गोरा-चिट्टा था और दूसरे ग्राहकों के साथ एकदम किसी अंग्रेज़ की तरह अंग्रेज़ी बोल रहा था. यदि वह स्वयं आकर हमारे साथ हिंदी में न बोलता, तो मैं भी शायद कभी जान न पाती कि वह भारतीय मूल का है. पहले एक-दो दिन तो बातें "इंडिया के क्या हाल हैं?", "अभी तो बहुत गर्मी होगी " तक ही सीमित रहीं. युवक बड़े अपनेपन से "इंडिया" के बारे में बातें करता और बड़े प्यार से हमें खाना परोसता। उसकी बातचीत के लहजे से मुझे लगा कि वह पंजाब से होगा. धीरे-धीरे वह अपने बारे में बताने लगा. उसने बताया कि वह पिछले पंद्रह साल से लंदन में रह रहा है और इन दिनों क़ानून की पढ़ाई कर रहा है. गर्मी में कॉलेज बंद है, इसलिए वह वेटर का काम करता है, वर्ना हमेशा वह यह काम नहीं करता. मैंने उससे यों ही पूछ लिया कि वह कहाँ से है. उसने बताया कि वह पाकिस्तान से है. हमने जब बताया कि हम दिल्ली में रहते हैं, तो वह काफ़ी उत्तेजित होकर कहने लगा कि उसके वालिद दिल्ली में रह चुके हैं, बड़ी ख़ूबसूरत जगह है, लेकिन वह कभी नहीं गया.
इंग्लैंड में बसे भारतीयों के बारे में बात चली तो उसने बताया, "यह होटल भी तो हमारे लोगों का है. वही मेजर शेयर होल्डर हैं इसके. " वह काफ़ी नीची आवाज़ में बोल रहा था और उस समय रेस्तराँ में शोर कुछ अधिक हो रहा था, इसलिए मैं उसकी बात साफ़-साफ़ सुन न सकी. जब मैंने उससे अपनी बात दोहराने की विनती की तो वह एकदम सम्भल कर बोला ," आपके लोगों का ही है यह होटल. वही मालिक हैं इसके." और फिर उसने कोई भारतीय नाम बताया. हालाँकि मैं पहले उसकी बात ठीक से सुन न सकी थी, फिर भी मैंने ग़ौर किया कि जहाँ पहले उसने "हमारे लोग" कहा था, वहीँ बाद में "आपके लोग" कहा. शायद उसने सोचा होगा कि मैं उसके भारतीयों को "हमारे लोग" कहने पर आपत्ति कर रही थी, जबकि ऐसा बिलकुल नहीं था, मैं तो उसकी इस बात से बहुत खुश हुई थी. जिस प्यार और अपनेपन से वह हमारे साथ पेश आया था, वह मुझे हमेशा याद रहेगा.तीसरी घटना रॉटरडॅम की ही है. कुछ दालें और मसाले खरीदने के लिए हम एक दुकान में गए थे. पश्चिमी यूरोप और अमेरिका के करीब हर बड़े शहर में इस तरह की दुकानें हैं, जहाँ भारतीय भोजन बनाने में उपयोग की जाने वाली खाद्य-सामग्री मिलती है. ऐसी दुकानों के मालिक अक्सर भारतीय ही होते हैं. बहरहाल, इस दुकान के मालिक हमसे बातचीत करने लगे. जनाब पाकिस्तान से थे. हमने बताया कि हम लोग तो कुछ ही महीनों के लिए आए हैं--मेरे पति इरास्मस विश्वविद्यालय में अतिथि प्राध्यापक के रूप में गए थे. जब उन सज्जन ने यह सुना तो वह गदगद हो गए. कहने लगे, "कितने फ़ख़्र की बात है कि हमारे लोगों में से कोई आकर इन लोगों को गणित पढ़ाए. "

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