Monday, May 4, 2026

यादों के पिटारे से: तीसरे मुल्क में "अपना आदमी"

मेरा यह लेख १९ अगस्त १९९३ को नई दिल्ली से प्रकाशित नवभारत टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था. 

लंदन के जिस होटल में हम ठहरे थे, वहाँ सुबह का नाश्ता परोसने वाले चुस्त-दुरुस्त युवक-युवतियों में से एक युवक हमारे पास आकर हमसे हिंदी में बतियाने लगा. युवक गोरा-चिट्टा था और दूसरे ग्राहकों के साथ एकदम किसी अंग्रेज़ की तरह अंग्रेज़ी बोल रहा था. यदि वह स्वयं आकर हमारे साथ हिंदी में न बोलता, तो मैं भी शायद कभी जान न पाती कि वह भारतीय मूल का है. पहले एक-दो दिन तो बातें "इंडिया के क्या हाल हैं?", "अभी तो बहुत गर्मी होगी " तक ही सीमित रहीं. युवक बड़े अपनेपन से "इंडिया" के बारे में बातें करता और बड़े प्यार से हमें खाना परोसता। उसकी बातचीत के लहजे से मुझे लगा कि वह पंजाब से होगा. धीरे-धीरे वह अपने बारे में बताने लगा. उसने बताया कि वह पिछले पंद्रह साल से लंदन में रह रहा है और इन दिनों क़ानून की पढ़ाई कर रहा है. गर्मी में कॉलेज बंद है, इसलिए वह वेटर का काम करता है, वर्ना हमेशा वह यह काम नहीं करता. मैंने उससे यों ही पूछ लिया कि वह कहाँ से है. उसने बताया कि वह पाकिस्तान से है. हमने जब बताया कि हम दिल्ली में रहते हैं, तो वह काफ़ी उत्तेजित होकर कहने लगा कि उसके वालिद दिल्ली में रह चुके हैं, बड़ी ख़ूबसूरत जगह है, लेकिन वह कभी नहीं गया. 

इंग्लैंड में बसे भारतीयों के बारे में बात चली तो उसने बताया, "यह होटल भी तो हमारे लोगों का है. वही मेजर शेयर होल्डर हैं इसके. " वह काफ़ी नीची आवाज़ में बोल रहा था और उस समय रेस्तराँ में शोर कुछ अधिक हो रहा था, इसलिए मैं उसकी बात साफ़-साफ़ सुन न सकी. जब मैंने उससे अपनी बात दोहराने की विनती की तो वह एकदम सम्भल कर बोला ," आपके लोगों का ही है यह होटल. वही मालिक हैं इसके." और फिर उसने कोई भारतीय नाम बताया. हालाँकि मैं पहले उसकी बात ठीक से सुन न सकी थी, फिर भी मैंने ग़ौर किया कि जहाँ पहले उसने "हमारे लोग" कहा था, वहीँ बाद में "आपके लोग" कहा. शायद उसने सोचा होगा कि मैं उसके भारतीयों को "हमारे लोग" कहने पर आपत्ति कर रही थी, जबकि ऐसा बिलकुल नहीं था, मैं तो उसकी इस बात से बहुत खुश हुई थी. जिस प्यार और अपनेपन से वह हमारे साथ पेश आया था, वह मुझे हमेशा याद रहेगा. 

दूसरी घटना, हम लोग हॉलैंड में थे. रॉटरडॅम शहर से कुछ ही दूर दो सौ-ढाई सौ साल पुरानी पवन चक्कियाँ डच लोगों ने अभी तक सहेज कर रखी हैं, जिन्हें देखने रोज़ कई पर्यटक आते हैं. जगह का नाम है किंडरडाइक.  वहाँ मुझे अपने बेटे के साथ हिंदी में बात करते सुनकर एक महिला हमारे पास आई. उम्र साठ के आसपास होगी. काफ़ी महंगे दिखने वाले कपड़े की सलवार-कमीज़ पहने दुपट्टे से सर ढके वह महिला किसी संभ्रांत परिवार की लग रही थी. बातचीत के दौरान पता चला कि वह पाकिस्तान से है. लेकिन पिछले कई सालों से अपने बेटों के साथ पेरिस में रह रही है. उसका एक बेटा रॉटरडॅम में रहता था, जिसके पास वह उन दिनों आई हुई थी. जब मैंने बताया कि मैं दिल्ली से आई हूँ, तो वह ऐसे प्रसन्न हुई, जैसे बरसों बाद आत्मीय जन मिलने पर कोई होता है. वह पुरानी दिल्ली के उन गली-मुहल्लों के नाम बताने लगी, जहाँ से उसकी शादी हुई थी और जहाँ उसने अपनी गृहस्थी पहली बार बसाई थी. उसने अपने पति और बेटे से भी हमारा परिचय करवाया और पूछा कि रॉटरडॅम वापस जाने के लिए हमारे पास कोई साधन है, वर्ना वह अपने बेटे की कार में हमें अपने घर ले जाएगी और खाना खिलाकर हमें हमारे फ्लैट भेजेगी. मैं उसके इस प्रस्ताव से अभिभूत थी. 

तीसरी घटना रॉटरडॅम की ही है. कुछ दालें और मसाले खरीदने के लिए हम एक दुकान में गए थे. पश्चिमी यूरोप और अमेरिका के करीब हर बड़े शहर में इस तरह की दुकानें हैं, जहाँ भारतीय भोजन बनाने में उपयोग की जाने वाली  खाद्य-सामग्री मिलती है. ऐसी दुकानों के मालिक अक्सर भारतीय ही होते हैं. बहरहाल, इस दुकान के मालिक हमसे बातचीत करने लगे. जनाब पाकिस्तान से थे. हमने बताया कि हम लोग तो कुछ ही महीनों के लिए आए हैं--मेरे पति इरास्मस विश्वविद्यालय में अतिथि प्राध्यापक के रूप में गए थे. जब उन सज्जन ने यह सुना तो वह गदगद हो गए. कहने लगे, "कितने फ़ख़्र की बात है कि हमारे लोगों में से कोई आकर इन लोगों को गणित पढ़ाए. "

पश्चिमी मुल्कों में मिले ये तीनों पाकिस्तानी --जिनका मैं नाम तक नहीं जानती--जिस तरह से पेश आए, उसमें यात्रा में मिले अजनबियों के साथ आमतौर पर किए जाने वाले सामान्य व्यवहार से कुछ अतिरिक्त था...कुछ अतिरिक्त ऊष्मा, अतिरिक्त नज़दीकी, अतिरिक्त अपनापन. हर बार मैं सोचती, इन लोगों से यदि मैं भारत में या पाकिस्तान में मिलती तो क्या हम इसी तरह से मिलते? तीसरे मुल्क में जाकर जहाँ एक पाकिस्तानी एक भारतीय को "अपना आदमी" समझने लगता है, वहीं अपने-अपने घर जाकर दोनों के बीच एक दीवार क्यों खड़ी हो जाती है? 

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