मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स के परिशिष्ट इंद्रधनुष में ४ सितम्बर, १९९३ को प्रकाशित हुआ था.
हॉलैण्ड के पश्चिमी तट के पास एक छोटा-सा क़स्बा है --लिस्से. इसी क़स्बे में बसा है क्यूकेनहॉफ़. क्यूकेनहॉफ़ वसंत ऋतु के सिर्फ़ दो महीनों में सैलानियों और पुष्पप्रेमियों के लिए खुला रहनेवाला एक सुन्दर उद्यान है. हॉलैण्ड में वसंत की शुरुआत मार्च के अंतिम दिनों में या अप्रैल के पहले हफ़्ते में होती है. और अप्रैल के महीने में ही खिलता है ट्यूलिप जिसके लिए हॉलैण्ड दुनिया भर में मशहूर है. अपने-आप में बेहद खूबसूरती संजोए ट्यूलिप के फूल पूरे साल में सिर्फ़ महीने-डेढ़ महीने ही खिलते हैं. क्यूकेनहॉफ़ में ट्यूलिप की ७०-८० क़िस्में अपने पूरे शबाब पर होती हैं और उन्हें देखने के लिए देश-विदेश से हजारों पर्यटक लिस्से आते हैं. इस उद्यान में इन्हीं दिनों में अन्य कई तरह के फूल भी खिलते हैं लेकिन ट्यूलिप के अद्भुत आकर्षण के सामने उनका सौंदर्य कुछ फ़ीका -सा लगता है.
क्यूकेनहॉफ़ ७० एकड़ क्षेत्र का एक विशाल उद्यान है. क्यारियों में रंग-बिरंगे ट्यूलिप इतने कलात्मक ढंग से उगाए जाते हैं कि तरह-तरह के रंगों के वर्ग या आयत दूर तक फैले हुए दिखाई पड़ते हैं. ट्यूलिप अपने डंठल पर बिलकुल सीधा खड़ा रहता है और ये डंठल एक-दूसरे से एकदम सटे हुए होते हैं इसलिए एक ही तरह के सौ-दो सौ या उससे भी ज़्यादा फूल हमेशा एक साथ खड़े दिखाई देते हैं.
अन्य सभी फूलों की तरह ट्यूलिप का फूल भी सबसे ज़्यादा सुन्दर तब लगता है जब वह अधखिला होता है. कभी उसकी पंखुड़ियां सिर्फ़ एक रंग की होती हैं, तो कभी दो या तीन रंगों की. कभी पंखुड़ी लाल हुई तो उसके किनारे सफ़ेद होते हैं, कभी पीली पंखुड़ी पर बीचोंबीच बड़ा-सा लाल निशान ऐसे दिखता है जैसे किसीने अपने अंगूठे से लम्बा लाल तिलक लगा दिया हो, तो कभी सफ़ेद रंग की पंखुड़ी पर केसरिया रंग की ऐसी बौछार होती है जैसे किसीने हाथ में तूलिका लेकर मनचाहे ढंग से छिटक दी हो. और फ़िर पचासों अलग-अलग रंग संयोजन और हर रंग की इतनी भिन्न छटाएँ कि उनके नाम किसी भी भाषा के शब्दकोष में न हों. पंखुड़ियों के किनारे कभी गोल तो कभी ऊपर से नुकीले तो कभी इतनी बारीकी और सफ़ाई से कटे हुए मानो किसी ने झालर लगा दी हो. प्रकृति का यह चमत्कार जब इतनी विविधता लिए हजारों-लाखों फूलों के रूप में हमारे सामने आता है तो सृष्टि के रचयिता के प्रति मन आस्था से भर उठता है.
हॉलैण्ड में बारिश का कोई मौसम नहीं होता. साल भर थोड़ी-थोड़ी बारिश होती रहती है. लेकिन बारिश के बावजूद क्यूकेनहॉफ़ का लुत्फ़ उठाने आए लोगों का उत्साह ख़त्म नहीं होता. हजारों की संख्या में लोग सर्द हवा के थपेड़ों को सहते अपनी छतरियों और रेनकोटों को संभालते इस "ट्यूलिप तीर्थ" की यात्रा करने आते हैं.
क्यूकेनहॉफ़ के आसपास के इलाके में ट्यूलिप के कई खेत हैं जहाँ ट्यूलिप की बाकायदा खेती होती है. पूरा खेत दूर से ऐसे दिखता है मानो किसीने रंगबिरंगा विशाल गलीचा बिछाया हो -- एक के बाद एक अलग-अलग रंग की सीधी पट्टियों वाला विशाल गलीचा। आज हॉलैण्ड में ४० हजार एकड़ भूमि पर ट्यूलिप की खेती होती है. हॉलैण्ड से बड़ी मात्रा में ट्यूलिप के फूलों और कंदों का निर्यात होता है. साल में सिर्फ़ महीना-डेढ़ महीना खिलने के बावजूद ट्यूलिप आज एक बड़ा उद्योग बन गया है. हॉलैण्ड की जलवायु ट्यूलिप के खिलने के लिए उपयुक्त तो है ही, वहाँ के निवासियों ने अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में ट्यूलिप के महत्त्व को पहचाना है, और वे ट्यूलिप के विकास में लगे हुए हैं.
हॉलैण्ड में ट्यूलिप हमेशा कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में दिख ही जाता है. वहाँ कभी छातों के हैण्डल ट्यूलिप के आकार में बने होते हैं तो कभी पुरुषों की "टाईज " ट्यूलिप के प्रिंट से सजी होती हैं. यहाँ तक कि हॉलैण्ड का राष्ट्रीय पेय "येनेवर " जिस विशेष गिलास में पिया जाता है, उसका आकार ट्यूलिप से प्रेरणा लेकर डिजाइन किया गया है.
ट्यूलिप की एक ख़ासियत है. जिस तरह अन्य फूलों के आकार या रंग संकरण से बदले जा सकते हैं, ट्यूलिप में यह प्रक्रिया अचानक, अपने-आप हो जाती है. ट्यूलिप उगानेवाले भी नहीं जानते कि उनके बोए कंदों में से कौनसा कंद एक नई क़िस्म के फूल को जन्म देगा, जिसका रंग और पंखुड़ियों का आकार ट्यूलिप की अन्य क़िस्मों से बिलकुल भिन्न होगा. इस नए ट्यूलिप से जितने कंद निकलते हैं, वे भी बिलकुल नए ट्यूलिप की ही तरह के फूलों को जन्म देते हैं.
अब वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि ट्यूलिप में बदलाव की यह प्रक्रिया "वाइरल संक्रमण" के कारण होती है लेकिन १७वीं सदी में तो इसे "चमत्कार" ही माना गया था और ट्यूलिप-उत्पादक सैंकड़ों कंद इकट्ठा कर इस बात का इंतज़ार करते रहते थे कि कब उनमें से नई क़िस्म का फूल खिलेगा.

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