Showing posts with label Culture. Show all posts
Showing posts with label Culture. Show all posts

Wednesday, October 29, 2025

यादों के पिटारे से: परंपरा के पुल पर एक यात्री

अमेरिकी सितारवादक स्कॉट मार्कस के साथ मेरी यह बातचीत नवभारत टाइम्स के २० मार्च, १९९३ के अंक में प्रकाशित हुई थी. कई साल गुज़र गए. हाल ही में स्कॉट के बारे में गूगल पर ढूँढ़ने पर पता चला कि वह सांता बारबरा स्थित युनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया के संगीत विभाग में अब भी कार्यरत हैं. २०२१ में आयोजित उनके सितारवादन का कार्यक्रम यूट्यूब पर उपलब्ध है. 

सांता बारबरा स्थित युनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया के विभिन्न भागों में पढ़ रहे भारतीय छात्र पिछले दिनों एक शाम इकट्ठे हुए थे. नया शैक्षिक साल अभी-अभी ही शुरू हुआ था. कुछ नए छात्र थे, जो पहली बार ही अन्य भारतीय छात्रों से मिल रहे थे. ऐसी शामें अक्सर एक-दूसरे से बतियाने और खाने-पीने में ही गुज़रती हैं. पर उस दिन बतियाने और खाने-पीने के बाद सितारवादन का एक कार्यक्रम हुआ. सितारवादक थे डॉ. स्कॉट मार्कस. ३९ - वर्षीय स्कॉट इसी विश्वविद्यालय के संगीत विभाग में प्रोफ़ेसर हैं. पता चला कि स्कॉट बहुत अच्छी हिंदी बोलते हैं. उनके पास जाकर मैंने सीधे हिंदी में ही बात करनी शुरू की और पाया कि स्कॉट वाक़ई अच्छी हिंदी बोलते हैं. उनसे और बातें करने का मन हुआ और एक दिन उनके साथ उनके ऑफ़िस में काफ़ी लम्बी बातचीत हुई. स्कॉट सिर्फ़ एक अच्छे सितारवादक ही नहीं, एक दिलचस्प इंसान भी हैं. वह क़रीब चार साल बनारस में रहे हैं--किसी पाँच -सितारा होटल में नहीं, बल्कि एक आम हिंदुस्तानी की तरह. स्कॉट गाँवों में गए, वहाँ घूमे, कुछ दिन रहे भी, नौटंकी देखी, रामलीला देखी और सितार बजाना सीखते रहे. बनारस के घाट उन्हें बहुत सुन्दर लगे. "गंगा माँ के पास बहुत शांति है"--वह कहते हैं. स्कॉट ने कुछ समय काहिरा में रहकर मध्य-पूर्व का वाद्य 'ऊद ' बजाना भी सीखा. वह मध्य-पूर्वी शैली में बाँसुरी भी बजाते हैं. अरबी भी उन्हें आती है. 

स्कॉट के कक्ष में प्रवेश करते ही सामने की दीवार पर राधा-कृष्ण का एक बड़ा-सा चित्र टंगा हुआ है. स्कॉट ने बताया कि वह दरअसल नौटंकी का एक परदा है. वीणावादिनी सरस्वती के दो चित्र भी हैं. एक जगह क़ाबा के चित्र के साथ एक अरबी कैलेंडर टंगा हुआ है.

आख़िर सितार में स्कॉट की दिलचस्पी हुई कैसे? स्कॉट ने बताया कि क़रीब बीस साल पहले जब वे वेस्लेयन विश्वविद्यालय, कनेक्टीकट में पहले वर्ष के छात्र थे तब संगीत या मानव-विज्ञान पढ़ने की उनकी इच्छा थी. उस  विश्वविद्यालय में कई देशों का संगीत सीखने की सुविधा थी. एक दिन एक कमरे के सामने से गुज़रते हुए स्कॉट को सितार के सुर सुनाई दिए. सुरों ने स्कॉट को आकर्षित किया और वह वहीं रुक कर सुनने लगे. सितारवादक ने स्कॉट को देखा तो उन्हें अंदर बुला लिया और स्वयं फ़िर सितार बजाने लगे. सितारवादक थे प्रोफ़ेसर रामदास चक्रवर्ती और वह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से अतिथि प्रोफ़ेसर के रूप में वेस्लेयन विश्वविद्यालय आए थे. स्कॉट बताते हैं, "राम बहुत फ्रेंडली थे, एकदम मस्त." सितार के सुरों ने तो स्कॉट को बाँधा ही था, रामदास चक्रवर्ती के दोस्ताना व्यवहार ने भी उन्हें आकर्षित किया. स्कॉट अपनी अंगुली पर लगा मिज़राब दिखाते हुए कहते हैं, "उन्होंने मिज़राब दिया था, तब से ही हाथ में है. मैं राम चक्रवर्ती से सितार सीखने लगा. "

मैंने पूछा , "फ़िर भारत जाने का मन कैसे हुआ?" 

स्कॉट ने बताया, " विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय का एक कार्यक्रम था 'इयर एब्रॉड ' जिसमें एक साल के लिए बाहर जाकर सीख सकते थे. मैं तिहत्तर में हिन्दुस्तान गया. वहाँ बनारस में रामदास चक्रवर्ती के गुरु अमिय गोपाल भट्टाचार्य से सितार सीखने लगा. अमिय बाबू प्राइवेट टीचर थे. वीज़ा के लिए ज़रूरी था कि मैं बी. एच. यू. में एनरोल करूँ. दोपहर में अमिय बाबू से सीखते थे. शाम को बी. एच. यू. जाते थे. अमिय बाबू से हमने बहुत सीखा. इयर एब्रॉड कार्यक्रम में सिर्फ़ एक साल हिंदुस्तान रहना था पर जब एक साल पूरा होने को आया तो मैं वहाँ और रहना चाहता था. मेरी एक साइकिल थी, एक नौकर था, किराये का मकान था, मैं हिंदी भी सीख रहा था. अंततः मैं वहीं रह गया. कुछ समय बाद राम चक्रवर्ती और उनकी शिष्या कृष्णा सान्याल भी वापस बी. एच. यू. आ गए. तो मैं एक ही समय अमिय बाबू, राम और कृष्णा --तीन जनरेशन्स --क्या कहते हैं हिंदी में?"

"पीढ़ियाँ. " मैंने बताया. 

"हाँ , तीन पीढ़ियों से सितार सीखने लगा. सितार ही सितार चल रहा था मेरी दुनिया में उस समय. रोज़ आठ घंटे रियाज़ करता था. कभी-कभी दस मिनट के लिए बाहर दुकान पर चाय पीने जाता था, तो चायवाले भी पूछते थे कि रियाज़ ठीक चल रहा है कि नहीं. १९७५ में अमिय बाबू गुज़र गए. बड़ी उम्र के थे. उसके बाद मैं सोचने लगा कि वापस लौटना है."

और फ़िर स्कॉट अमेरिका लौट आए. यू  सी. एल. ए. (लॉस एंजेलिस स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय) में पीएच. डी.  प्रोग्राम शुरू किया. वहाँ लेबनॉन के एक संगीतज्ञ के संपर्क में आए तो मध्य-पूर्वी (मिडिल ईस्टर्न) संगीत में भी रुचि हुई. कुछ सालों बाद स्कॉट काहिरा गए, मध्य-पूर्व का वाद्य 'ऊद ' बजाना सीखा और बाँसुरी भी. दरअसल उनकी पीएच. डी. की थीसिस का विषय भी मध्य-पूर्व के संगीत से ही संबंधित है. 

संगीत के दो एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न प्रकारों को एक ऐसे व्यक्ति द्वारा सीखना जिसकी अपनी संस्कृति उन दोनों से ही अलग हो, और उसे ही अपना 'करियर ' बनाना अपने आप में  बहुत बड़ी बात है. 

स्कॉट बाद में दो बार फ़िर भारत गए. उन्होंने भोजपुरी लोकगीतों में 'बिरहा' और 'कजली' पर काफ़ी काम किया. स्कॉट जब पहली बार भारत गए और तीन साल वहाँ रहे थे तभी भोजपुरी लोकगीतों में उनकी रुचि हुई थी. उनके नौकर का गाँव बनारस से सिर्फ़ १८ मील दूर था और स्कॉट अक्सर अपनी साइकिल से वहाँ जाकर लोकगीत सुना करते थे. बाद में जब वे इन लोकगीतों पर काम कर रहे थे तब उन्हें सुनने के लिए वे गाँव की कई बारातों में गए और लोकगीत रिकॉर्ड करते रहे. 

"अमेरिका के मुक़ाबले एक तो भारत वैसे ही कम विकसित देश है. फ़िर आप जिस तरह की जिंदगी वहाँ जीये, आपको कोई तकलीफ़, कोई असुविधा नहीं हुई?"

"नहीं, वह तो मेरे लिए एक रोमांच था. सिर्फ़ आख़िर के कुछ दिनों में पेट की गड़बड़ी हुई थी." स्कॉट ने मुस्कुरा कर बताया. 

"भारतीय शास्त्रीय संगीत दैवीय माना जाता है. वह आपको ईश्वर के क़रीब ले जाता है. क्या आपने ऐसा महसूस किया?"

"हाँ , सुर के पास शक्ति है. बजानेवाले को महसूस होता है. नादब्रह्म अपने आप में एक बहुत पॉवरफुल कांसेप्ट है. ध्वनि में रचनात्मक शक्ति है. संगीत ध्यान है."

एक शाम मैं युनिवर्सिटी में स्कॉट की सितार की कक्षा में गई थी. देखा कि क़रीब १०-१२ छात्रों की कक्षा में तीन छात्र भारतीय थे. ये छात्र इंजीनियरिंग या गणित जैसे विषयों की पढ़ाई करने के लिए अमेरिका आए हैं और साथ ही सितार भी सीख रहे हैं. यह देख कर बहुत अच्छा लगा कि स्कॉट अपने अमेरिकी छात्रों को भी 'क्या बात है' कह कर ही दाद दे रहे थे. तब मुझे महसूस हुआ कि 'क्या बात है' की टक्कर का कोई शब्द अंग्रेज़ी में है ही नहीं. 

स्कॉट भारत जाकर हिंदी तो सीखे ही, वहाँ के कुछ संस्कार भी उन्होंने आत्मसात किए. उनकी कक्षा में जब एक छात्र का पैर उसकी नोटबुक से छू रहा था तो स्कॉट ने उसे टोका और उस छात्र ने तुरंत नोटबुक वहाँ से हटा ली. स्कॉट मानते हैं कि यहाँ के लोगों के लिए यह समझ पाना मुश्किल है कि अगर सितार फ़र्श पर रखी हो तो उसे लांघ कर नहीं, उसकी बगल से निकल जाना चाहिए या यह कि कागज़ विद्या का रूप होता है, उसे पैर से नहीं छूना चाहिए, लेकिन इन बातों को बताए बिना स्कॉट से नहीं रहा जाता. 

इन छोटी-छोटी बातों को देखकर मानना पड़ता है कि स्कॉट ने भारत जाकर सिर्फ़ सितार बजाना ही नहीं सीखा, बल्कि भारत को पूरे मन से जिया भी है और हज़ारों मील दूर कैलिफोर्निया में भी भारत उनके आसपास है, उनके साथ है. 

Friday, March 21, 2025

यादों के पिटारे से : एक भारत महोत्सव, भारत में भी हो

हाल ही में फिल्म "इमर्जेंसी " देखते हुए पर्दे पर कई बार पुपुल जयकर के क़िरदार से आमना-सामना हुआ. आज की पीढ़ी के कई लोग उनसे वाक़िफ़ नहीं होंगे. वह इंदिरा गाँधी की बचपन की मित्र तो थीं ही, प्रधान मंत्री बनने के बाद भी इंदिरा गाँधी का उनके साथ बहुत निकट का नाता था. फिल्म के दौरान मुझे उस बातचीत की याद आई जो मैंने दिल्ली में पुपुल जयकर के साथ की थी, और जो इंटरव्यू की शक्ल में ९ जून, १९८५ के नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुई थी. मैं उस समय नवभारत टाइम्स में बतौर उप-संपादक काम करती थी. अब वह दुनिया बहुत पीछे छूट चुकी है, लेकिन अख़बार के पीले पड़ चुके पन्नों पर अपने लेख आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं. कुछ पन्ने जर्जर हो गए हैं. सोचा, क्यों न अपनी इन यादों को अपने ब्लॉग पर सहेज कर रखूँ.  तो यह है उसी कोशिश की पहली कड़ी, यानी पूरा इंटरव्यू जस का तस: 

पहला भारत महोत्सव लंदन में १९८२ में आयोजित हुआ था. उसकी परिकल्पना और संयोजन में श्रीमती पुपुल जयकर ने प्रमुख भूमिका निभाई थी. फ़्रांस और अमेरिका में हो रहे भारत महोत्सव में भी उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण है--वह भारत महोत्सव की सलाहकार समिति की अध्यक्ष हैं. श्रीमती जयकर लम्बे समय से हस्तकला और हथकरघा की दुनिया से जुड़ी हुई हैं और इससे सम्बद्ध महत्त्वपूर्ण पदों पर काम करती रही हैं. उन पर कृष्णमूर्ति के दर्शन का गहरा असर है. ७० बरस पहले उत्तर प्रदेश के इटावा में जन्मी श्रीमती जयकर आज भी अपने काम में सक्रिय हैं.

फ़्रांस और अमेरिका में हो रहे भारत महोत्सव को लेकर कुछ सवालों के साथ मैंने उनके निवास, ११ सफ़दरजंग रोड पर उनसे बातचीत की. बातचीत शुरू करने से पहले ही उन्होंने साफ़-साफ़ कहा--" तुम जो पूछना चाहो, बेहिचक पूछो. कोई भी सवाल मुझे बुरा नहीं लगेगा." वे आराम से, बड़ी तसल्ली के साथ, मुस्कुराते हुए बातचीत करती हैं और हिंदी के बजाय अंगेज़ी में बात करना उन्हें ज़्यादा आसान लगता है. बातचीत के कुछ अंश:

भारत महोत्सव के उपलक्ष्य में १९८५ में जारी डाक टिकट 

भारत महोत्सव का उद्देश्य विदेश में भारत की छवि पेश करना है. लेकिन कैसी छवि?

हम विदेशियों के सामने भारत की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करना चाहते हैं. हम इसी की भरसक कोशिश कर रहे हैं. कई क्षेत्रों के लोग इसमें हिस्सा लेने जा रहे हैं. इससे वहाँ के लोग जानेंगे कि हमारा संगीत कैसा है, हमारा रंगमंच कैसा है, हमारा नृत्य कैसा है, प्रदर्शनकारी कलाएँ कैसी हैं... 

लेकिन यह सब तो एक आम भारतीय आदमी तक भी नहीं पहुँचता. उसे अच्छा संगीत सुनने या अच्छा नाटक, नृत्य देखने का मौका ही कहाँ मिलता है ?

यह बिलकुल सही है कि उसे मौका नहीं मिलता. मैं खुद काफ़ी अरसे से यह कोशिश कर रही हूँ  कि एक भारत महोत्सव भारत में ही किया जाए, जिससे हमारे लोग, हमारे युवा, हमारे बच्चे हमारी महान सांस्कृतिक परम्परा के बारे में जानें, उसे उसके सही रूप में देख पाएँ. मैंने सरकार के सामने यह सुझाव रखा भी है. 

इस तरह के महोत्सव के आयोजन में क्या ऐसा नहीं लगता कि हम अपनी "संस्कृति" को डिब्बाबंद किसी चीज़ की तरह बाहर भेज रहे हैं?

तो इसका और कौन-सा तरीका हो सकता है?

विदेश से विभिन्न क्षेत्रों के जाने-माने लोगों को यहाँ भी तो बुलाया जा सकता है. वे अपनी तरह से भारत को देखेंगे और अपने देश लौटकर उसके बारे में लोगों को बताएँगे. या फ़िर पर्यटकों को ज़्यादा सुविधाएँ , सस्ते हवाई टिकट दिए जा सकते हैं. 

पर्यटक सुविधाएँ नहीं चाहते. वर्ना भारत के दरवाज़े तो हमेशा खुले रहे हैं. पर्यटक किसी भी वक़्त आ सकते थे. लेकिन उनके दिमाग़ के सांस्कृतिक दायरे में भारत की कोई जगह थी ही नहीं. पर हम जानते हैं कि हमारी सांस्कृतिक परम्परा जितनी प्राचीन है, उतनी ही महान भी. इसीलिए भारत की नई प्रगतिशील तस्वीर के साथ दुनिया के सामने उसकी प्राचीन परम्पराओं की तस्वीर पेश करना हमारी ज़िम्मेदारी है. 

और किसी देश ने तो अपनी संस्कृति के प्रदर्शन का ऐसा कोई आयोजन किसी अन्य देश में नहीं किया?

नहीं, इतना बड़ा सांस्कृतिक आयोजन पहले कभी कहीं नहीं हुआ. 

यह महोत्सव इतना लम्बा क्यों है? सुना है अमेरिका में १८ महीने  चलेगा.

मुख्य कार्यक्रम तो करीब इस दिसम्बर तक ख़त्म हो जाएँगे। फ़िर ४०-५० अलग-अलग प्रदर्शनियाँ अमेरिका के ६० - ७० शहरों का दौरा करेंगी. यह काफ़ी दिनों तक चलता रहेगा. फ़िर समापन समारोह के वक़्त एक और बड़ा आयोजन हो सकता है. यदि हमें विदेशियों को हमारा देश दिखाना ही है, तो पूरी शान के साथ दिखाना चाहिए, वर्ना ऐसे आयोजन का कोई मतलब नहीं है.

लंदन में भारत महोत्सव हुए काफ़ी अर्सा हो गया. उसका कोई साफ़-साफ़ प्रभाव नज़र आता है?

बिलकुल! वहाँ भारत की पृष्ठभूमि पर अचानक इतनी सारी फिल्में बनीं. महोत्सव ने वहाँ भारत के बारे में सोई भावनाओं को लोगों के मन में फ़िर से जगा दिया. 

वहाँ रहने वाले भारतीयों के साथ अंग्रेज़ों के बर्ताव में क्या कोई सुधार हुआ है? क्या वे भारतीयों की ओर एक अलग नज़रिये से देख पाते हैं?

देखो, यह तो राजनीतिक सवाल है. भारतीयों के प्रति अंग्रेज़ों के रवैये के बारे में मैं कोई टिप्पणी करना नहीं चाहती.


आप पिछले दिनों अमेरिका में थीं. वहाँ के लोग कितने उत्सुक हैं इस महोत्सव को लेकर?

बहुत! वहाँ अख़बारों -पत्रिकाओं में भारत के बारे में खूब छप रहा है. "नॅशनल जियोग्राफ़िक " भारत पर आठ फीचर तैयार कर रहा है. लोग अचानक भारत के बारे में जानना चाहते हैं. यह सब जो भारत को मिला है, वह तो लाखों डॉलर के बदले भी नहीं खरीदा जा सकता था. 

इस समारोह में हिस्सा लेने जा रहे और न जा रहे कलाकारों को लेकर पिछले दिनों काफ़ी विवाद खड़ा हुआ था?

हज़ारों कलाकार हैं हमारे देश में. ज़ाहिर है हर कलाकार नहीं जा सकता. यह सम्भव ही नहीं है. चयन समिति में अलग-अलग क्षेत्रों के लोग हैं. फ़िर हमें सिर्फ़ दिल्ली या बम्बई के ही कलाकारों को नहीं लेना है, मणिपुर और असम और मद्रास से भी कलाकार आएँ तभी तो भारत का सच्चा प्रतिनिधित्व हो सकेगा. अब इस सब में कुछ लोगों का नाराज़ होना तो बिलकुल स्वाभाविक है. 

यह इतना बड़ा आयोजन है. इसकी तैयारी तो काफ़ी समय से चल रही होगी. लेकिन इसके बारे में लोगों को अभी कुछ दिन पहले ही पता चला है...

हाँ, पिछला एक वर्ष हमारे देश के लिए बड़ा दुःखद रहा. और ऐसे समय उत्सवों की बातें नहीं की जाती हैं. फ़िर  ३१ अक्तूबर के बाद तीन महीनों तक मेरे दिमाग़ में महोत्सव का ख्याल तक नहीं आ सका. यह तो वाक़ई एक जादुई करिश्मा ही कहिए कि हम निर्धारित समय पर इस महोत्सव का आयोजन कर पा रहे हैं. 

इसके लिए होने वाले खर्च का क्या हिसाब है?

कलाकारों की हवाई यात्रा और कलाकृतियों, वाद्यों आदि को वहाँ ले जाने की ज़िम्मेदारी हमारी है. वहाँ हमारा सारा खर्च वे ही लोग यानी फ़्रांस और अमेरिका की सरकार उठाएगी.

भारत महोत्सव के लिए इतना खर्च उठाने में अमेरिका या फ़्रांस की क्या दिलचस्पी हो सकती है?

शायद वे भारत से और ज़्यादा दोस्ती करना चाहते हैं. 

क्या महोत्सव के दौरान भारतीय चीज़ें, जैसे कपड़े या हस्तकला की अन्य वस्तुएँ बेची जाएँगी ?

नहीं, महोत्सव तो व्यावसायिक नहीं है लेकिन हथकरघा और हस्तकला निर्यात निगम कुछ चीज़ें बेच रहा है. फ़िर अमेरिका की एक बहुत बड़ी व्यावसायिक श्रृंखला, "ब्लूमिंगडेल्स" अपनी १९ दुकानों में भारतीय सामान बेचेगी. और भी कई दुकानों में ये चीज़ें बिकेंगी. तो इस तरह से २० से ३० करोड़ रुपए तो सीधे इस बिक्री से ही मिल सकते हैं. औद्योगिक क्षेत्र में अमेरिका भारत से सहयोग करेगा, यह उम्मीद भी है. 

महोत्सव में प्रदर्शन के लिए कई अनमोल कलाकृतियाँ बाहर भेजी गई हैं. उनकी सुरक्षा को लेकर आप चिंतित नहीं हैं?

चिंतित होने का सवाल ही नहीं उठता. पहले भी हम ऐसी वस्तुओं को विदेश भेज चुके हैं. और उन्हें विदेश भेजने पर किसी को क्या ऐतराज़ हो सकता है. खतरा तो कोई चीज़ मद्रास से दिल्ली भेजने में भी है. और फ़िर जिन संग्रहालयों में हमारी कलाकृतियाँ जा रही हैं, वे दुनिया के श्रेष्ठ संग्रहालयों में से हैं. मैं आपको यक़ीन दिला सकती हूँ कि वहाँ इनकी पूरी हिफ़ाज़त होगी.

मैं चिंतित हूँ तो हमारे ही देश में कलाकृतियों, प्राचीन मूर्तियों, पुरातन भवनों और स्मारकों की सुरक्षा को लेकर. ये सब अनमोल हैं और देश में जहाँ-तहाँ बिखरे पड़े हैं लेकिन उनकी क़द्र नहीं की जा रही. लोग पुराने भवन देखने जाते हैं तो उनकी दीवारों पर अपने नाम लिख देते हैं. पुरानी मूर्तियों की अक़्सर चोरियाँ होती रहती हैं. 

देश में सांस्कृतिक मूल्य की प्राचीन वस्तुओं की सुरक्षा और रख-रखाव के उद्देश्य से हमने एक ट्रस्ट बनाया है--"इंडियन नॅशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एण्ड कल्चरल हेरिटेज". हमारी सांस्कृतिक परम्परा की रक्षा करना बहुत ज़रूरी है. यह परम्परा सिर्फ़ कलाकृतियों में ही नहीं होती, हमारे आचार-व्यवहार, हमारे रहन-सहन, हमारे मूल्यों में होती है. इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि अपने बच्चों के लिए इसे सहेजकर रखें, उन्हें यह सब सिखाएँ.

एक और बात बता दूँ. जनता शासन के दौरान एक प्रदर्शनी फ़्रांस गई थी. और आज जो कुछ लोग इस महोत्सव को लेकर सवाल उठा रहे हैं, वे उस वक़्त उस प्रदर्शनी से जुड़े भी थे. 

इस महोत्सव के दौरान यह भी तो हो सकता है कि हमारी बेजोड़ कलाकृतियों की प्रतिकृतियाँ बना ली जाएँ ?

जब हम अपनी कलाकृतियाँ स्मिथसोनियन और मेट्रोपोलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट में प्रदर्शन के लिए भेजते हैं, तो हमें इस तरह के सवाल नहीं पूछने चाहिए. फ़िर हमारी कलाकृतियों की प्रतिकृतियाँ बनाना कोई आसान काम थोड़े ही है. 

क्या इस तरह का कोई आयोजन दूसरे ग़रीब देशों में किए जाने की कोई योजना है--यानी लातीनी अमेरिकी या अफ़्रीकी देशों में?

यह तय करने का काम तो सरकार का ही है.