Thursday, March 27, 2025

Khakee: The Bengal Chapter...A Tangy Jhalmuri!

Web series Khakee: The Bihar Chapter (2022) was inspired by a non-fiction book that police officer Amit Lodha wrote in 2018. It received mostly positive responses. Its makers have added another chapter to it that began streaming on Netflix last week. Khakee: The Bengal Chapter is a fictional story in the same genre. 

It is a tangy jhalmuri served to discerning viewers who already know what to expect from a Neeraj Pandey offering. Along with the bevy of talented actors, Kolkata plays a major role in the series in the form of its stunning visuals and characteristic ambience. Competent actors, fast-paced narration and technologically excellent production kept me hooked on to the story, even though I did not relate much to the characters in the first two episodes. Later, I got a better hold on the story.

The series focuses on the nexus between politicians, police, business persons and underworld. The plot is full of twists and turns building up to the climax in the seventh episode. Fickle relationships, shifting loyalties, greed and betrayal play havoc in the lives of characters that form the main framework of this tale. Every time there was gore and graphic violence on the screen, I turned my face away. And I had to do this many times! I wish they had gone easy on this. 

The performances by all the actors are top class. Parambrata Chatterjee, the lovable cop from "Kahaani" is adorable again in a special appearance. The other two Chatterjees--Saswata (Bob Biswas from Kahaani), and Prosenjit (leading actor of Bengali cinema and son of actor Biswajit) are terrific as gangster Bagha and politician Barun Roy respectively. The surprise package here is Jeet (Jeetendra Madnani, a prominent actor, producer, writer and television presenter in Bengali film industry) in his debut role in a Hindi production. He looms large as SIT Chief Arjun Maitra in every frame that he is a part of. More fireworks are unleashed by the duo Ritwik Bhowmik and Aadil Zafar Khan as Bagha's ferocious henchmen who carry out his orders unflinchingly. Ritwik Bhowmik's transition from a mild-mannered, soft-spoken classical singer in "Bandish Bandits" to a ruthless gangster is remarkable. Women have comparatively less prominent roles. But the characters have been written very well. All are believable. Chitrangada Singh as the leader of opposition Nibedita Basak and Aakanksha Singh as SIT officer Aratrika Bhowmik are noteworthy. All other women in smaller roles are adequate.

These days web series are shot on a grand scale and this series is no exception. The elaborate indoor shots and extensive outdoor scenes are impressive. Hope the Khakee team comes up with another chapter from a different state incorporating local talents and flavours as they have done here. Asha kori amra seta dekhte pabo!

Tuesday, March 25, 2025

यादों के पिटारे से: मंगलसूत्र, बिंदिया और सिंदूर के बहाने

मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स के ५ जुलाई १९८९ के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था. ज़ाहिर है, इसमें जिन सामाजिक परिस्थितियों का उल्लेख हुआ है, उनमें और आज के हालात में काफ़ी अंतर है. इसलिए इसे उसी परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जाना चाहिए. अपने पुराने लेखों को अपने ब्लॉग पर संजो कर रखने के मेरे प्रयास की अगली कड़ी:


किसी पुरुष को देखकर क्या आप जान सकते हैं कि वह विवाहित है या नहीं? नहीं, क्योंकि विवाह के बाद पुरुष के रहन-सहन में या पहनावे में कोई अंतर नहीं आता. लेकिन विवाह के बाद महिला कई तरह के "सौभाग्यसूचक" चिन्हों से लाद दी जाती है. मसलन गले में मंगलसूत्र, कलाइयों में चूड़ियाँ, माथे पर बिंदिया, मॉंग में सिंदूर, पैरों में बिछिया-पायल आदि. पति की मृत्यु के बाद औरत के लिए इन चीज़ों का इस्तेमाल वर्ज्य हो जाता है. जबकि पत्नी की मृत्यु के बाद किसी पुरुष पर इस तरह का कोई प्रतिबंध नहीं लगता. 

हो सकता है कि कुछ महिलाएँ शौक से इन "सौभाग्यसूचक" चिन्हों का इस्तेमाल करती हों, तो कुछ सुन्दर और आकर्षक दिखने के लिए इनका सहारा लेती हों. कुछ यह सोचकर इन्हें अपनाती होंगी कि जब उनकी माँ, सास, नानी, दादी सभी ने यह किया है, तो उन्हें भी यही करना है. कुछ महिलाएँ समाज के डर से या इस डर से कि उन्होंने "सौभाग्यसूचक" चिन्ह नहीं पहने तो उनके पति का अनिष्ट होगा, इन्हें अपनाती होंगी. लेकिन इन सबसे हटकर जो औरतें इनकी अनिवार्यता के बारे में सवाल उठाती हैं, या इन्हें पहनने से इनकार करती हैं, वे आलोचना का शिकार बनती हैं. 

ऐसा नहीं है कि माथे पर बिंदिया लगाने से या गले में मंगलसूत्र पहनने से औरत को बड़ी भारी असुविधा होती हो. लेकिन उसे सोचने का मौका दिए बगैर, जब ये चीज़ें उस पर थोंप दी जाती हैं और उससे अपेक्षा की जाती है कि वह इन्हें दिन-रात, सोते-जागते अपने से अलग न करे, तो  ज़रूर कुछ असुविधा होती है. 

इस अनिवार्यता में से सवाल उठता है कि समाज में औरत की पहचान क्या सिर्फ़ अपने पति की वजह से होती है. यानी पति जीवित है तो पत्नी इन सौभाग्यसूचक अलंकरणों से सजी-धजी गुड़िया है और पति नहीं है तो इन सबसे विहीन बैरागिनी? इसी सिलसिले में एक घटना याद आ रही है. एक बुज़ुर्ग की ७५वीं वर्षगाँठ उनके बेटों-बहुओं ने बड़े ठाठ-बाठ से मनाई. इन बुज़ुर्ग की पत्नी को गुज़रे कई वर्ष हो चुके हैं. वर्षगाँठ के सिलसिले में कुछ धार्मिक रस्में अदा की गईं. इसके लिए एक पंडितजी बुलाए गए. जब इन बुज़ुर्ग ने पंडितजी के सामने अपना स्थान ग्रहण किया तो पंडितजी ने कहा, "श्रीमान, रस्म शुरू करने से पहले अपनी श्रीमतीजी को भी तो बुलाइए." इस पर वह बुज़ुर्ग जितने दुःखी और विचलित हुए वह तो सबने देखा. लेकिन शायद ही किसीने यह सोचा होगा कि ऐसी हालत में इनकी पत्नी यहाँ होती तो पंडितजी उन्हें अपने पति को बुलाने का आदेश नहीं देते क्योंकि उनकी वेषभूषा ही बता देती कि वह विधवा है.

महाराष्ट्र में किसी भी मुबारक़ मौक़े पर सौभाग्यवती महिलाएँ एक-दूसरे के माथे पर कुंकुम लगाती हैं. तीज-त्योहारों पर महिलाएँ अन्य सौभाग्यवती महिलाओं को अपने घर आमंत्रित करती हैं और तब भी कुंकुम का आदान-प्रदान होता है. दक्षिण भारत में भी ऐसी परम्परा है. पुराने ज़माने में जब औरतें घर से बाहर आती-जाती नहीं थीं, तब ऐसे मौक़ों के बहाने घर से बाहर निकलकर एक-दूसरे से मिल-जुल लेती थीं. लेकिन विधवाओं को ऐसे मौक़ों पर नहीं बुलाया जाता था और आज भी नहीं बुलाया जाता. बस, यही बात इस प्रथा की सारी अच्छाइयों पर पानी फेर देती है. क्या विधवाओं को अपनी हमउम्र स्त्रियों से मिलने-जुलने की या धार्मिक, सामाजिक आयोजनों में हिस्सा लेकर अपना मन बहलाने की ज़रूरत महसूस नहीं होती? पर ऐसे मौक़ों पर अलग रखकर उन्हें मानो बार-बार इस बात की याद दिलाई जाती है कि उनके पति जीवित नहीं हैं. इस तरह यदि उनके घावों पर लगातार नमक छिड़का जाता रहे तो वे अपने पति की मृत्यु के दुःख से कैसे उबर सकती हैं?

इसीलिए मंगलसूत्र पहनना या माँग में सिंदूर भरना बुरा नहीं है. बुरी हैं तो उनके साथ जुड़ी वे तमाम मान्यताएँ जो पति के जीवित या मृत होने के आधार पर औरत-औरत के बीच फ़र्क करती हैं. बुरे हैं तो वे प्रचलित विश्वास कि सौभाग्यसूचक चिन्ह धारण न करना अशुभ या अमंगल है. बुरी है तो वह आलोचना जिसकी शिकार अपनी इच्छा से सौभाग्यसूचक चिन्हों का त्याग करनेवाली सौभाग्यवती महिलाएँ होती हैं. 

औरत को औरत की तरह ही देखा जाना ज़रूरी है. पति के होने न होने से औरत की ओर देखने के नज़रिए में अंतर क्यों आना चाहिए? विधवाओं के केश काट देने की प्रथा जैसे धीरे-धीरे खत्म हुई है उसी तरह पति के जीवित रहते पत्नी द्वारा सौभाग्यसूचक चिन्हों के उपयोग और पति के मरने पर पत्नी द्वारा उन चिन्हों के त्याग को एक अनिवार्यता न बनाकर क्यों न इसे हर स्त्री की इच्छा पर छोड़ दिया जाए?

Friday, March 21, 2025

यादों के पिटारे से : एक भारत महोत्सव, भारत में भी हो

हाल ही में फिल्म "इमर्जेंसी " देखते हुए पर्दे पर कई बार पुपुल जयकर के क़िरदार से आमना-सामना हुआ. आज की पीढ़ी के कई लोग उनसे वाक़िफ़ नहीं होंगे. वह इंदिरा गाँधी की बचपन की मित्र तो थीं ही, प्रधान मंत्री बनने के बाद भी इंदिरा गाँधी का उनके साथ बहुत निकट का नाता था. फिल्म के दौरान मुझे उस बातचीत की याद आई जो मैंने दिल्ली में पुपुल जयकर के साथ की थी, और जो इंटरव्यू की शक्ल में ९ जून, १९८५ के नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुई थी. मैं उस समय नवभारत टाइम्स में बतौर उप-संपादक काम करती थी. अब वह दुनिया बहुत पीछे छूट चुकी है, लेकिन अख़बार के पीले पड़ चुके पन्नों पर अपने लेख आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं. कुछ पन्ने जर्जर हो गए हैं. सोचा, क्यों न अपनी इन यादों को अपने ब्लॉग पर सहेज कर रखूँ.  तो यह है उसी कोशिश की पहली कड़ी, यानी पूरा इंटरव्यू जस का तस: 

पहला भारत महोत्सव लंदन में १९८२ में आयोजित हुआ था. उसकी परिकल्पना और संयोजन में श्रीमती पुपुल जयकर ने प्रमुख भूमिका निभाई थी. फ़्रांस और अमेरिका में हो रहे भारत महोत्सव में भी उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण है--वह भारत महोत्सव की सलाहकार समिति की अध्यक्ष हैं. श्रीमती जयकर लम्बे समय से हस्तकला और हथकरघा की दुनिया से जुड़ी हुई हैं और इससे सम्बद्ध महत्त्वपूर्ण पदों पर काम करती रही हैं. उन पर कृष्णमूर्ति के दर्शन का गहरा असर है. ७० बरस पहले उत्तर प्रदेश के इटावा में जन्मी श्रीमती जयकर आज भी अपने काम में सक्रिय हैं.

फ़्रांस और अमेरिका में हो रहे भारत महोत्सव को लेकर कुछ सवालों के साथ मैंने उनके निवास, ११ सफ़दरजंग रोड पर उनसे बातचीत की. बातचीत शुरू करने से पहले ही उन्होंने साफ़-साफ़ कहा--" तुम जो पूछना चाहो, बेहिचक पूछो. कोई भी सवाल मुझे बुरा नहीं लगेगा." वे आराम से, बड़ी तसल्ली के साथ, मुस्कुराते हुए बातचीत करती हैं और हिंदी के बजाय अंगेज़ी में बात करना उन्हें ज़्यादा आसान लगता है. बातचीत के कुछ अंश:

भारत महोत्सव के उपलक्ष्य में १९८५ में जारी डाक टिकट 

भारत महोत्सव का उद्देश्य विदेश में भारत की छवि पेश करना है. लेकिन कैसी छवि?

हम विदेशियों के सामने भारत की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करना चाहते हैं. हम इसी की भरसक कोशिश कर रहे हैं. कई क्षेत्रों के लोग इसमें हिस्सा लेने जा रहे हैं. इससे वहाँ के लोग जानेंगे कि हमारा संगीत कैसा है, हमारा रंगमंच कैसा है, हमारा नृत्य कैसा है, प्रदर्शनकारी कलाएँ कैसी हैं... 

लेकिन यह सब तो एक आम भारतीय आदमी तक भी नहीं पहुँचता. उसे अच्छा संगीत सुनने या अच्छा नाटक, नृत्य देखने का मौका ही कहाँ मिलता है ?

यह बिलकुल सही है कि उसे मौका नहीं मिलता. मैं खुद काफ़ी अरसे से यह कोशिश कर रही हूँ  कि एक भारत महोत्सव भारत में ही किया जाए, जिससे हमारे लोग, हमारे युवा, हमारे बच्चे हमारी महान सांस्कृतिक परम्परा के बारे में जानें, उसे उसके सही रूप में देख पाएँ. मैंने सरकार के सामने यह सुझाव रखा भी है. 

इस तरह के महोत्सव के आयोजन में क्या ऐसा नहीं लगता कि हम अपनी "संस्कृति" को डिब्बाबंद किसी चीज़ की तरह बाहर भेज रहे हैं?

तो इसका और कौन-सा तरीका हो सकता है?

विदेश से विभिन्न क्षेत्रों के जाने-माने लोगों को यहाँ भी तो बुलाया जा सकता है. वे अपनी तरह से भारत को देखेंगे और अपने देश लौटकर उसके बारे में लोगों को बताएँगे. या फ़िर पर्यटकों को ज़्यादा सुविधाएँ , सस्ते हवाई टिकट दिए जा सकते हैं. 

पर्यटक सुविधाएँ नहीं चाहते. वर्ना भारत के दरवाज़े तो हमेशा खुले रहे हैं. पर्यटक किसी भी वक़्त आ सकते थे. लेकिन उनके दिमाग़ के सांस्कृतिक दायरे में भारत की कोई जगह थी ही नहीं. पर हम जानते हैं कि हमारी सांस्कृतिक परम्परा जितनी प्राचीन है, उतनी ही महान भी. इसीलिए भारत की नई प्रगतिशील तस्वीर के साथ दुनिया के सामने उसकी प्राचीन परम्पराओं की तस्वीर पेश करना हमारी ज़िम्मेदारी है. 

और किसी देश ने तो अपनी संस्कृति के प्रदर्शन का ऐसा कोई आयोजन किसी अन्य देश में नहीं किया?

नहीं, इतना बड़ा सांस्कृतिक आयोजन पहले कभी कहीं नहीं हुआ. 

यह महोत्सव इतना लम्बा क्यों है? सुना है अमेरिका में १८ महीने  चलेगा.

मुख्य कार्यक्रम तो करीब इस दिसम्बर तक ख़त्म हो जाएँगे। फ़िर ४०-५० अलग-अलग प्रदर्शनियाँ अमेरिका के ६० - ७० शहरों का दौरा करेंगी. यह काफ़ी दिनों तक चलता रहेगा. फ़िर समापन समारोह के वक़्त एक और बड़ा आयोजन हो सकता है. यदि हमें विदेशियों को हमारा देश दिखाना ही है, तो पूरी शान के साथ दिखाना चाहिए, वर्ना ऐसे आयोजन का कोई मतलब नहीं है.

लंदन में भारत महोत्सव हुए काफ़ी अर्सा हो गया. उसका कोई साफ़-साफ़ प्रभाव नज़र आता है?

बिलकुल! वहाँ भारत की पृष्ठभूमि पर अचानक इतनी सारी फिल्में बनीं. महोत्सव ने वहाँ भारत के बारे में सोई भावनाओं को लोगों के मन में फ़िर से जगा दिया. 

वहाँ रहने वाले भारतीयों के साथ अंग्रेज़ों के बर्ताव में क्या कोई सुधार हुआ है? क्या वे भारतीयों की ओर एक अलग नज़रिये से देख पाते हैं?

देखो, यह तो राजनीतिक सवाल है. भारतीयों के प्रति अंग्रेज़ों के रवैये के बारे में मैं कोई टिप्पणी करना नहीं चाहती.


आप पिछले दिनों अमेरिका में थीं. वहाँ के लोग कितने उत्सुक हैं इस महोत्सव को लेकर?

बहुत! वहाँ अख़बारों -पत्रिकाओं में भारत के बारे में खूब छप रहा है. "नॅशनल जियोग्राफ़िक " भारत पर आठ फीचर तैयार कर रहा है. लोग अचानक भारत के बारे में जानना चाहते हैं. यह सब जो भारत को मिला है, वह तो लाखों डॉलर के बदले भी नहीं खरीदा जा सकता था. 

इस समारोह में हिस्सा लेने जा रहे और न जा रहे कलाकारों को लेकर पिछले दिनों काफ़ी विवाद खड़ा हुआ था?

हज़ारों कलाकार हैं हमारे देश में. ज़ाहिर है हर कलाकार नहीं जा सकता. यह सम्भव ही नहीं है. चयन समिति में अलग-अलग क्षेत्रों के लोग हैं. फ़िर हमें सिर्फ़ दिल्ली या बम्बई के ही कलाकारों को नहीं लेना है, मणिपुर और असम और मद्रास से भी कलाकार आएँ तभी तो भारत का सच्चा प्रतिनिधित्व हो सकेगा. अब इस सब में कुछ लोगों का नाराज़ होना तो बिलकुल स्वाभाविक है. 

यह इतना बड़ा आयोजन है. इसकी तैयारी तो काफ़ी समय से चल रही होगी. लेकिन इसके बारे में लोगों को अभी कुछ दिन पहले ही पता चला है...

हाँ, पिछला एक वर्ष हमारे देश के लिए बड़ा दुःखद रहा. और ऐसे समय उत्सवों की बातें नहीं की जाती हैं. फ़िर  ३१ अक्तूबर के बाद तीन महीनों तक मेरे दिमाग़ में महोत्सव का ख्याल तक नहीं आ सका. यह तो वाक़ई एक जादुई करिश्मा ही कहिए कि हम निर्धारित समय पर इस महोत्सव का आयोजन कर पा रहे हैं. 

इसके लिए होने वाले खर्च का क्या हिसाब है?

कलाकारों की हवाई यात्रा और कलाकृतियों, वाद्यों आदि को वहाँ ले जाने की ज़िम्मेदारी हमारी है. वहाँ हमारा सारा खर्च वे ही लोग यानी फ़्रांस और अमेरिका की सरकार उठाएगी.

भारत महोत्सव के लिए इतना खर्च उठाने में अमेरिका या फ़्रांस की क्या दिलचस्पी हो सकती है?

शायद वे भारत से और ज़्यादा दोस्ती करना चाहते हैं. 

क्या महोत्सव के दौरान भारतीय चीज़ें, जैसे कपड़े या हस्तकला की अन्य वस्तुएँ बेची जाएँगी ?

नहीं, महोत्सव तो व्यावसायिक नहीं है लेकिन हथकरघा और हस्तकला निर्यात निगम कुछ चीज़ें बेच रहा है. फ़िर अमेरिका की एक बहुत बड़ी व्यावसायिक श्रृंखला, "ब्लूमिंगडेल्स" अपनी १९ दुकानों में भारतीय सामान बेचेगी. और भी कई दुकानों में ये चीज़ें बिकेंगी. तो इस तरह से २० से ३० करोड़ रुपए तो सीधे इस बिक्री से ही मिल सकते हैं. औद्योगिक क्षेत्र में अमेरिका भारत से सहयोग करेगा, यह उम्मीद भी है. 

महोत्सव में प्रदर्शन के लिए कई अनमोल कलाकृतियाँ बाहर भेजी गई हैं. उनकी सुरक्षा को लेकर आप चिंतित नहीं हैं?

चिंतित होने का सवाल ही नहीं उठता. पहले भी हम ऐसी वस्तुओं को विदेश भेज चुके हैं. और उन्हें विदेश भेजने पर किसी को क्या ऐतराज़ हो सकता है. खतरा तो कोई चीज़ मद्रास से दिल्ली भेजने में भी है. और फ़िर जिन संग्रहालयों में हमारी कलाकृतियाँ जा रही हैं, वे दुनिया के श्रेष्ठ संग्रहालयों में से हैं. मैं आपको यक़ीन दिला सकती हूँ कि वहाँ इनकी पूरी हिफ़ाज़त होगी.

मैं चिंतित हूँ तो हमारे ही देश में कलाकृतियों, प्राचीन मूर्तियों, पुरातन भवनों और स्मारकों की सुरक्षा को लेकर. ये सब अनमोल हैं और देश में जहाँ-तहाँ बिखरे पड़े हैं लेकिन उनकी क़द्र नहीं की जा रही. लोग पुराने भवन देखने जाते हैं तो उनकी दीवारों पर अपने नाम लिख देते हैं. पुरानी मूर्तियों की अक़्सर चोरियाँ होती रहती हैं. 

देश में सांस्कृतिक मूल्य की प्राचीन वस्तुओं की सुरक्षा और रख-रखाव के उद्देश्य से हमने एक ट्रस्ट बनाया है--"इंडियन नॅशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एण्ड कल्चरल हेरिटेज". हमारी सांस्कृतिक परम्परा की रक्षा करना बहुत ज़रूरी है. यह परम्परा सिर्फ़ कलाकृतियों में ही नहीं होती, हमारे आचार-व्यवहार, हमारे रहन-सहन, हमारे मूल्यों में होती है. इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि अपने बच्चों के लिए इसे सहेजकर रखें, उन्हें यह सब सिखाएँ.

एक और बात बता दूँ. जनता शासन के दौरान एक प्रदर्शनी फ़्रांस गई थी. और आज जो कुछ लोग इस महोत्सव को लेकर सवाल उठा रहे हैं, वे उस वक़्त उस प्रदर्शनी से जुड़े भी थे. 

इस महोत्सव के दौरान यह भी तो हो सकता है कि हमारी बेजोड़ कलाकृतियों की प्रतिकृतियाँ बना ली जाएँ ?

जब हम अपनी कलाकृतियाँ स्मिथसोनियन और मेट्रोपोलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट में प्रदर्शन के लिए भेजते हैं, तो हमें इस तरह के सवाल नहीं पूछने चाहिए. फ़िर हमारी कलाकृतियों की प्रतिकृतियाँ बनाना कोई आसान काम थोड़े ही है. 

क्या इस तरह का कोई आयोजन दूसरे ग़रीब देशों में किए जाने की कोई योजना है--यानी लातीनी अमेरिकी या अफ़्रीकी देशों में?

यह तय करने का काम तो सरकार का ही है. 

Tuesday, March 18, 2025

A Fun Ride On A Dupahiya!

Web series "Panchayat" was a favourite watch for most of us. We liked its clean humour, honest portrayal of rural life, and excellence in all departments of production. To even think of creating something in the same genre requires courage, conviction and confidence in one's craft. That it would be compared with its predecessor is a given. The makers of "Dupahiya" (Two-wheeler) have come up with a refreshing and enjoyable show in spite of this challenge.

The series is set in the fictional village of Dhadakpur in Bihar. A wedding is being fixed and the groom-to-be demands a dupahiya as part of the dowry. The fun ride on the dupahiya begins and continues in nine hilarious episodes, each marking a day in a countdown to the wedding day. Along with humour, there is suspense, thrill, song and dance, and drama; but no violence, bad words or skin show. 


The story also deals with adult literacy, women's empowerment, dowry demands, kleptomania and the bias in our society towards dark skin.
But all of this is cleverly woven into the story without making it preachy or overly sentimental. The narration is fast-paced with top-notch performances from the main cast, and well-written lines delivered in the local accent. 

Sparsh Shrivastava whom we have seen and appreciated in Jamtara and Laapataa Ladies is in scintillating form. He gives an uninhibited performance doing bizarre acts. Gajraj Rao and Renuka Shahane are veterans, though Renuka appears to be a bit stiff and not so comfortable with the accent at places. The surprise package is Avinash Dwivedi, who apart from being one of the writers of the series, also plays the groom. His character, right from his dress sense to his mannerisms and his use of English words in a sentence is a laugh riot.

Most of the situations are amusing and capable of invoking laughter except the one involving Dollar, the owl. It is stretched, inane and not in sync with the rest of the story. Otherwise, most of the time it is wholesome entertainment, good storytelling and a welcome addition to the genre of rural comedy.

Dupahiya is streaming on Prime Video.