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Monday, September 15, 2025

"Ullozhukku": An Emotional Undercurrent!

The torrential rains play as important a role in "Ullozhukku" (The Undercurrent) as do the two female leads. The 2024 Malayalam film shot on location in the backwaters of Kerala soaks the viewers not only in floods of water, but also in an outpouring of emotions as they witness the journey of Anju and Leelamma, the daughter-in-law and mother-in-law portrayed wonderfully by the very talented team of Parvathy Thiruvothu and Urvashi respectively. The story of the duo's intertwined relationship is at the centre of this brilliantly crafted film.

The pounding rain has been used very effectively by writer and director Christo Tomy. The continuous onslaught of sheets of water drenching Leelamma's house and its surroundings makes the viewers uneasy. The rain also serves as an apt metaphor for the emotional turmoil of the two lead players. It starts moderately, turns into a huge downpour and then starts clearing towards the end. 

What makes the film stand out is the fact that this is Tomy's debut feature filmIt has received critical acclaim and awards. It won the National Film Award for Best Malayalam Feature Film. Urvashi bagged the same for Best Actress in a Supporting Role. The film also won Kerala State Film Awards in several categories.

Anju works as a saleswoman in a saree shop. She is in love with Rajeev who does not have a secure job. Anju is married off to a well-to-do Thomaskutty by her parents. As she is trying to come to terms with her new life in this loveless marriage, Thomaskutty's failing health makes her take on the role of a caretaker for her new husband. The couple lives with Thomaskutty's mother Leelamma in a comfortable house in a flood-prone area. The two women linked by the ailing Thomaskutty get entangled in a stormy relationship where secrets tumble out changing the dynamics of the equation between them multiple times. 

Tomy has handled this part with a lot of care, giving each character enough time to project themselves. Also, he has written his characters very well. At times, the narration may seem to be slow, but then the characters are so well fleshed out that it is a pleasure watching them on the screen. No scheming, no plotting, no exaggerated expressions, no melodrama...pure storytelling at its best. The narration is layered, the characters are neither black, nor white, but a graceful grey and hence very believable. The verdant landscape of Kerala is a treat to the eyes, although at times the water in and around the house is unsettling. The boat trips the characters make to get to the mainland are a visual delight. 

The two male actors playing Rajeev and Thomaskutty have smaller roles and they are good at it. The cinematography is superb and the music is appropriately understated. 

I recommend this film to those who enjoy meaningful cinema. It is streaming on Prime Video. I watched it in original Malayalam with subtitles in English. If I could follow the dialogues in Malayalam, it would have added another dimension to my appreciation of the film. 

And finally, some trivia. Parvathy Thiruvothu was seen with Irrfan Khan in the 2017 romantic comedy "Qarib Qarib Singlle" and with Pankaj Tripathi in the 2023 psychological thriller "Kadak Singh". Urvashi acted in 1988 political thriller "New Delhi". Both of them have worked largely in Malayalam, Tamil, Kannada and Telugu cinema.

Wednesday, April 9, 2025

यादों के पिटारे से: बहू -बेटी की मौत से पुण्य कमाने वाले समाज से कुछ सवाल

 मेरा यह लेख २७ सितम्बर, १९८७ के नवभारत टाइम्स में रविवार्ता के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था. 

अठारह वर्षीया रूपकँवर दुल्हन के वेश में कितनी सुंदर लग रही थी! सिर से पैर तक गहनों से लदी, नखशिखांत श्रृंगार के साथ. लेकिन वह विवाह की वेदी पर नहीं, अपने पति की चिता पर चढ़ने जा रही थी--उसके साथ जलकर भस्म होने के लिए. 

राजस्थान के सीकर जिले के दिवराला गाँव में अभी आठ महीने पहले ही तो रूपकँवर दुल्हन बनकर आई थी. अपने पिता के घर से भरपूर दहेज के साथ. २५ तोला सोना, टेलीविजन, रेडियो, पंखे, फ्रिज... क्या नहीं लाई थी वह अपने साथ! एक सुखी गृहस्थी का सपना आँखों में लिए रूपकँवर ने अपने पति मानसिंह के घर में कदम रखा था. ज़िंदगी अपनी तरह चल रही थी कि अचानक सितम्बर की पहली तारीख़ को मानसिंह को उल्टी -दस्त होने लगे. उसे सीकर के सरकारी अस्पताल में दाखिल कराया गया. लेकिन चार सितम्बर का दिन उसकी ज़िंदगी का आख़री दिन रहा. मानसिंह की मृत्यु के साथ ही रूपकँवर ने सती होने की इच्छा व्यक्त की. उसके परिवारवालों ने न तो इसका विरोध किया और न ही इसकी ख़बर किसीको होने दी. 

आज... यदि प्रधानमंत्री के घिसे-पिटे मुहावरे का उपयोग किया जाए तो... जब देश २१वीं सदी में प्रवेश करने को तैयार है तब रूपकँवर द्वारा सदियों पुरानी इस प्रथा का पालन करना कई सवाल खड़े करता है. एक तो यह कि दसवें दर्जे तक पढ़ी रूपकँवर को पति की मृत्यु के बाद सती होने के अलावा और कोई रास्ता क्यों नज़र नहीं आया? दूसरे यह कि उसकी ससुरालवालों ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? --इस संदर्भ में कहीं यह दहेज हत्या का दूसरा रूप तो नहीं, या क्या उसकी ससुरालवाले इतने अंधविश्वासी हैं कि बहू की मौत में ही उन्हें अपना पुण्य नज़र आया; या बहू के सती होने में उन्हें अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने का आसान रास्ता दिख गया? तीसरे यह कि क्या प्रशासन और क़ानून पूरी तरह से अंधे-बहरे हो गए हैं जो रूपकँवर को सती होने से रोक नहीं सके? (पुलिस द्वारा कुछ महिलाओं को सती होने से रोकने की ख़बरें पहले मिली हैं लेकिन यहाँ पुलिस का कहना है कि उन्हें कोई सूचना ही नहीं मिली) और चौथा सवाल उन हज़ारों -हज़ार लोगों को लेकर है जो रूपकँवर का सती होना एक तमाशे की तरह देखते रहे, लेकिन उसे रोकने के लिए कुछ नहीं कर सके. 

इन सवालों के स्पष्ट जवाब शायद कभी न मिल पाएँ लेकिन इनका उठना निरर्थक नहीं है. इनके जवाब ढूँढ़ने की कोशिश की जाए तो आधुनिकता का दंभ भरनेवाले समाज का वह बदबूदार पिछवाड़ा दिखता है जो हर तरह की गंदगी से पटा पड़ा है और जिसे साफ़ करना कोई नहीं चाहता. 

हो सकता है, विधवा की कलंकित ज़िंदगी जीना रूपकँवर को रास न आता नज़र आया हो और उसने अपने ज़िंदगी का अंत कर लेने में ही अपनी भलाई समझी हो. रूपकँवर के मामले में बात करते हुए सीकर जिले के ही एक ग्रामीण ने कहा, 'हमारे समाज में विधवा को कुलच्छनी माना जाता है. उसे नंगे पैर चलना पड़ता है, ज़मीन पर सोना पड़ता है. वह घर से बाहर नहीं निकल सकती और किसी पुरुष से बात भी नहीं कर सकती. ऐसी ज़िंदगी जीने से तो अच्छा हुआ वह मर ही गई.'

रूपकँवर के पिता भी कोई अनपढ़, गँवार ग्रामीण नहीं हैं. जयपुर में उनकी एक ट्रांसपोर्ट एजेंसी है. लेकिन अपनी बेटी के सती होने पर वह कहते हैं, 'रूपकँवर के त्याग ने हमारे दोनों ख़ानदानों को अमर बना दिया है. मेरी बेटी तो अब 'देवी' बन गई है जिसकी हज़ारों श्रद्धालु पूजा करेंगे.' वह प्रसन्न हैं कि उनकी बेटी ने उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाई है. 

जब सती हो गई महिला के परिवारवाले, उसकी ससुरालवालों के साथ उसके पिता भी अपनी बेटी के बलिदान को लेकर इतने प्रसन्न हैं, तो इस घटना के लिए क़ानून और प्रशासन को दोष देने से पहले एक बार सोचना पड़ता है. अदालत का क़ानून और सरकार का निर्देश जनता के लिए क्या मायने रखता है, यह तो उसी समय पता चल गया कि जब सती के १३ दिनों बाद होने वाले चूंदड़ी महोत्सव को सरकारी आदेश की धज्जियाँ उड़ाते हुए किसी त्योहार की-सी धूमधाम से मनाया गया. राजस्थान के कुछ महिला संगठनों की अपील पर राजस्थान उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि रूपकँवर की चूंदड़ी चढ़ाने की रस्म पर समारोह न होने दिया जाए. इसके बावजूद लाखों लोगों की मौजूदगी में रूपकँवर की चिता पर सुहाग की प्रतीक चूंदड़ी चढ़ाई गई. यह चूंदड़ी चार हज़ार एक सौ रूपए की बताई जाती है और इसे रूपकँवर के मायकेवाले लाए थे. इस समारोह का तय समय से दो घंटे पहले ही हो जाना, समारोह के दौरान सती-स्थल पर पुलिस की गैर-मौजूदगी, समारोह स्थल पर गाँव के स्वयंसेवकों का हुक्म और राजपूत नौजवानों का चिता के आसपास नंगी तलवारें लिए लगातार परिक्रमा करना यह बताता है कि जिस बात को आम आदमी का जबरदस्त समर्थन हो, उसे रोकना क़ानून और सरकार के बस की बात नहीं।

लेकिन इस बात को आम आदमी का इतना जबरदस्त समर्थन मिलने के क्या कारण हो सकते हैं? इसका जवाब ढूँढ़ने के लिए हमें उन मान्यताओं, विश्वासों, अंधविश्वासों की पड़ताल करनी होगी जो सदियों से हमारे यहाँ बच्चों को घुट्टी में पिलाए जाते हैं. हमारे यहाँ मृत्यु को जीवन का अंत न मानकर मोक्ष प्राप्त करने की ओर बढ़ाया गया एक कदम माना जाता है. यहाँ महिलाएँ साल-दर-साल एक विशेष दिन व्रत रखती हैं कि अगले जन्म में भी उन्हें यही पति मिले. यहाँ यह माना गया है कि मृत्यु के बाद की दुनिया में भी व्यक्ति को वही सब मिले जो इस जन्म में उसे सुख-शांति देता रहा है. पति के साथ जल मरने को पतिव्रत्य का महानतम उदाहरण माना गया. इन 'अलौकिक' कारणों के साथ कुछ लौकिक कारण भी समय-समय पर इससे जुड़ते गए जैसे कि घर-परिवार में विधवा के साथ होनेवाले व्यवहार को देखकर कुछ महिलाओं ने सती होने का निर्णय किया हो या जैसे मुग़लों के भय से, आत्मसम्मान की रक्षा की ख़ातिर राजपूत महिलाओं ने जौहर (सामूहिक सती) किया. 

इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि सती एक सामाजिक मान्यता है. हमारे यहाँ के किसी शास्त्र में इस प्रथा का उल्लेख नहीं है. ऋग्वेद और अथर्ववेद में ज़रूर ऐसी प्रथा के संकेत मिलते हैं. गरुड़पुराण और भागवतपुराण में भी सती का उल्लेख है. लेकिन हर घर में सती प्रथा का पालन होता था, ऐसा नहीं है. बल्कि समय-समय पर इसे रोकने की कोशिश भी होती रही. अकबर और जहांगीर ने सती प्रथा को दबाया. फिर आगे चलकर अंतिम पेशवा बाजीराव और मराठा महारानी अहिल्याबाई ने भी लोगों में सती प्रथा के खिलाफ जागरूकता फैलाई. अंत में राजा राममोहन राय के प्रयासों के फलस्वरूप लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने सन १८२९ में सती प्रथा पर निषेध लगा दिया. 

लेकिन एक बात ग़ौर करने लायक है --सती प्रथा को सिर्फ़ हिन्दू मान्यताओं ने ही जन्म दिया हो--ऐसा नहीं है. एशिया के अलावा अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में भी मृत व्यक्ति के साथ उसकी पत्नी/पत्नियाँ, ग़ुलाम, क़ैदी और घोड़े जलाए या दफ़नाए जाते थे. लेकिन भारत में इसे जैसा सामाजिक समर्थन मिला, उसके चलते निषेध लगने के १५८ साल बाद आज भी सती हो जाने के इक्का-दुक्का उदाहरण मिल ही जाते हैं. 

इसी सिलसिले में रूपकँवर का सती होना हमें फिर एक बार अपनी सामाजिक व्यवस्था को जाँचने के लिए कहता है--ऐसी व्यवस्था जहाँ अभी यह माना जाता है कि पति के बाद पत्नी का कोई स्थान नहीं है--न परिवार में, न समाज में. जब तक यह मान्यता नहीं बदलती, तब तक कोई विधवा चाहे घुट-घुटकर जीने को मजबूर की जाए, चाहे पति के साथ जलकर मर जाए--शायद कोई फ़र्क नहीं पड़ता. 

Monday, April 7, 2025

"यादों के पिटारे से: 'मेरा चुनाव लोगों ने ही लड़ा'---सुमित्राजी

भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता सुमित्रा महाजन २०१४ से २०१९ तक लोकसभा की स्पीकर रहीं. वह  १९८९ से २०१९ तक लगातार इंदौर लोकसभा क्षेत्र से भाजपा की प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीतीं. उनकी छवि एक कुशल और साफ़-सुथरी नेता की रही है. मुझे १९८९ में दिल्ली में उनसे मिलने का और बातचीत करने का मौक़ा मिला. उस समय उन्हें पहली बार सांसद बनकर कुछ महीने ही हुए थे. वह एक आम मध्यवर्गीय मराठीभाषी महिला की तरह बहुत सादगी से मुझसे मिलीं. उनकी सादगी वरिष्ठ नेता बनने के बाद भी क़ायम रही.सुमित्राजी इंदौर में 'ताई' के नाम से लोकप्रिय हैं. आज यदि मैं उनके बारे में लिखती तो उन्हें ताई ही कहती.  २४ दिसंबर १९८९ के नवभारत टाइम्स में स्तम्भ 'नए चेहरे' के अंतर्गत मेरी उनके साथ की गई बातचीत प्रकाशित हुई थी. आज उसीको अपने ब्लॉग पर संजो कर रख रही हूँ. 

इंदौर से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर लोकसभा के लिए चुनी गईं सुमित्रा महाजन के बारे में सबसे पहली बात तो यह कि उन्होंने करीब चार साल तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार में एक समय गृह, रेल और पेट्रोलियम एवं रसायन जैसे विभागों के मंत्री रह चुके कांग्रेसी दिग्गज प्रकाशचंद सेठी को हराया है. करीब तीन साल पहले दिल्ली से बम्बई बात कर रहे श्री सेठी का फोन अचानक कट जाने पर उनके आधी रात किदवई भवन ट्रंक एक्सचेंज पहुँचने, वहाँ गाली-गलौज करने, पिस्तौल निकाल लेने और ड्यूटी पर तैनात महिला कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार करने की ख़बरें उस वक़्त सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से छपी थीं. खबर यह भी थी कि श्री सेठी मानसिक असंतुलन के शिकार हैं. ट्रंक एक्सचेंज वाली घटना की तरह कुछ और घटनाएँ भी हुईं जिन्होंने मानो उनके मानसिक असंतुलन वाली बात की पुष्टि कर दी. 

पिछले कुछ दिनों में सेठीजी ख़बरों में नहीं के बराबर थे तो लगा कि वे राजनीति के वानप्रस्थ काल में पहुँच गए हैं. ऐसे व्यक्ति को इंदौर से टिकट देकर कहीं कांग्रेस ने स्वयं ही इंदौर में अपनी हार को न्यौता तो नहीं दिया था? इस सवाल के जवाब में सुमित्राजी कहती हैं: 'नहीं, नहीं. सेठीजी जीत भी सकते थे. हो सकता है मेरी बजाय कोई और उनका सामना करता तो जीत ही जाते. यूँ जीत के प्रति आश्वस्त तो कोई नहीं होता... मैं भी नहीं थी. आख़िर सेठीजी इससे पहले जीतते ही तो आए हैं.'

जीत के प्रति आश्वस्त होना तो दूर, सुमित्राजी बताती हैं कि लोकसभा चुनाव लड़ने का उनका कोई ख़ास इरादा भी नहीं था. लेकिन पार्टी की इच्छा थी इसलिए वह चुनावी मैदान में उतरीं. उनकी उम्मीदवारी की ख़बर सुनकर कई लोगों के मन में यह सवाल आया और कुछ ने तो उनसे पूछा भी कि सेठीजी चुनाव पर जितना खर्च कर सकते हैं उसका मुक़ाबला न तो आप कर सकती हैं, न ही आपकी पार्टी. फिर उनका सामना आप कैसे करेंगी? सुमित्राजी का जवाब होता था--आप देखिए, लोग मुझे वोट भी देंगे और नोट भी देंगे. और यही हुआ भी. लोग आते और सुमित्राजी से कहते: सुमित्रा ताई ( दीदी के लिए मराठी शब्द), हमारे घर में दस वोट हैं, ये लीजिए दस रूपए.' तो एक तरह से मेरा चुनाव लोगों ने ही लड़ा. युवाओं ने, महिलाओं ने मेरे लिए बहुत काम किया.' सुमित्राजी अपने कार्यकर्ताओं के प्रति अभिभूत होकर बताती हैं. 

वैसे अपनी पार्टी और उसके उम्मीदवारों के लिए सुमित्राजी भी काफ़ी काम करती रही हैं. इमर्जेंसी के बाद १९७७ में जब कुछ लोगों ने जेल के भीतर से ही चुनाव लड़ा तब सुमित्राजी उनके समर्थन में बहुत सक्रिय रहीं. १९८५ के विधानसभा चुनाव में सुमित्राजी ने पहली बार अपनी क़िस्मत आजमाई लेकिन उस समय उन्हें हराकर कांग्रेस के महेश जोशी विधायक बने. 

सुमित्राजी विधायक नहीं बन सकीं लेकिन वह एक अर्से से इंदौर में धार्मिक और सामाजिक प्रवचनकार के रूप में जानी जाती रही हैं. धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या करने की उनकी रोचक और रसपूर्ण शैली इंदौर के मध्यवर्गीय मराठीभाषी परिवारों में काफ़ी लोकप्रिय है. यही मध्यवर्गीय मराठीभाषी परिवार इंदौर के मतदाताओं का काफ़ी बड़ा हिस्सा बनाते हैं. इनके बीच सुमित्राजी की छवि एक ऐसी साफ़-सुथरी मध्यवर्गीय गृहिणी की है, जो राजनीति की कालिख और गंदगी से बहुत दूर है. ' लेकिन मैं राजनीति में हूँ और अपनी जीत के बाद अब दावे से कह सकती हूँ कि राजनीति में अभी भी साफ़-सुथरे लोगों के लिए जगह है, और यह भी कि सिर्फ़ पैसे के बल पर ही चुनाव नहीं जीते जाते. '

सुमित्राजी लोकसभा में इंदौर का प्रतिनिधित्व करेंगी, लेकिन वह मूलतः इंदौर की नहीं हैं. इंदौर इनकी ससुराल है और शादी के बाद पिछले २४ वर्षों से वे इंदौर में रह रही हैं. महाराष्ट्र के एक कस्बे चिपलूण में पली-बढ़ीं सुमित्राजी ने मैट्रिक तक की पढ़ाई चिपलूण में ही की. फ़िर बम्बई आ गईं. माता-पिता की मृत्यु बहुत जल्दी हो गई थी. शादी के बाद अपने पति और परिवार की मदद से सुमित्राजी ने बी. ए. की शिक्षा पूर्ण की. मनोविज्ञान में एम. ए. किया, एल. एल. बी. भी किया. इसी बीच वह दो बेटों की माँ बनीं. अपने बेटों की परवरिश और परिवार की जिम्मेदारी के साथ-साथ शहर के सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक परिवेश में सक्रिय रहीं और अब जब बेटे बड़े हो गए हैं( बड़ा बेटा इंजीनियर है और छोटा बी. एस-सी. के दूसरे साल में है) तब सुमित्राजी देश के सर्वोच्च सदन में इंदौर का प्रतिनिधित्व कर रही हैं. 

सुमित्राजी प्रदेश महिला मोर्चा की महामंत्री हैं. साथ ही बाल संरक्षण गृह, अनाथालय, महिला सुधार गृह जैसी संस्थाओं की समिति की सदस्या हैं. पिछले दिनों इन्होंने अहिल्या मातृशक्ति संवर्धन केंद्र का गठन किया है जहाँ पीड़ित महिलाओं को कानूनी सहायता दी जाएगी. तलाक़ के मामले, दहेज़ के मामले आदि भी सुलझाए जाएँगे। कामकाजी औरतों के बच्चों के लिए झूलाघर शुरू किया है. वैसे तलाक़ के मामलों में सुमित्राजी अपने पति (जो कि वकील हैं) की भी सहायता करती रही हैं. उनकी कोशिश रहती है कि कोर्ट में जाने से पहले ही किसी तरह मामला सुलझ जाए. 

इंदौर के करीब देवास और पीथमपुर में कई उद्योगों के खुलने से इंदौर प्रदेश का सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र हो गया है, लेकिन उस हिसाब से वहाँ विकास उतना नहीं हुआ है जितना होना चाहिए. पानी की समस्या यहाँ की एक बड़ी समस्या है. सुमित्राजी नर्मदा योजना का दूसरा चरण शीघ्र पूरा कराने का प्रयास करेंगी. शहर की आबादी और वाहनों की संख्या के अनुपात में वहाँ की सड़कें बहुत सँकरी हैं. इस समस्या का समाधान शहर के बाहरी किनारों पर रिंग रोड बनवा कर किया जा सकेगा.

एक समय अपने कपड़ा उद्योग के लिए प्रसिद्ध इंदौर की कई मिलें बीमार पड़ी हैं जिसके कारण बेरोज़गारी बढ़ी है. सुमित्राजी की कोशिश रहेगी कि इन बीमार मिलों को शुरू कराया जाए. आसपास के गाँवों तक पक्की सड़कें नहीं तो कम-से-कम पहुँच-मार्ग बनें. सुमित्राजी का मानना है कि जब सांसद और विधायक साथ मिलकर काम करेंगे, तब ही अपने क्षेत्र के लिए कुछ ठोस उपलब्धियाँ हासिल कर पाएँगे.

सुमित्राजी काफ़ी आशावान हैं. १९६७ और १९७७ को छोड़कर हमेशा कांग्रेसी उम्मीदवार को लोकसभा भेजनेवाले इंदौर ने पहली बार भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी को दिल्ली भेजा है. १९६७ में सिटीजन्स फोरम के होमी दाजी (अब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में) और १९७७ में जनता पार्टी के कल्याण जैन (अब जनता दल में) इंदौर से निर्वाचित हुए थे. अब यदि इंदौर की जनता ने इस ४६-वर्षीया 'गृहिणी' को करीब एक लाख १२ हजार मतों से जिताया है तो इसी उम्मीद के साथ कि वह उनकी घरों को, उनके नगर को अपने कुशल हाथों से सँवारेंगी. 

Friday, April 4, 2025

यादों के पिटारे से: आधुनिक बालाओं को पुरातनी सीख

मेरा यह लेख १२ नवम्बर, १९९२ के नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुआ था. इसमें लिखी कुछ बातें शायद आज के माहौल में विसंगत लगें, लेकिन यह तीन दशक अधिक से पहले लिखा गया था और इसलिए इसे उसी परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जाना चाहिए. अपने पुराने लेखों को अपने ब्लॉग पर संजो कर रखने की मेरी कोशिश की अगली कड़ी है यह पोस्ट: 

महिलाओं की एक अंग्रेज़ी पत्रिका के सितम्बर अंक में टीनएज (१३ से १९ वर्ष की उम्रवाली) लड़कियों को एक अनमोल सलाह दी गई है. एक पन्ने के इस लेख में बताया गया है कि किस तरह लड़कियाँ अपने बॉयफ्रेंड को किसी दूसरी लड़की की ओर आकर्षित होने से रोक सकती हैं. इससे पहले कि इस लेख पर कोई टिप्पणी की जाए, ज़रा पढ़ लीजिए कि यह लेख आख़िर कहता क्या है--

"लड़कियों, लड़के आख़िर लड़के ही हैं. आपका बॉयफ्रेंड भी अपने यार-दोस्तों के साथ कुछ समय बिताना चाहेगा. उसे इतनी आज़ादी दीजिए कि वह रात में अपने दोस्तों के साथ घूमने जा सके, वीडियो गेम खेल सके या चाहे तो 'ब्लू फिल्म' भी देख सके. उसे कुछ समय अपनी तरह से बिताने दीजिए. आख़िर आप भी तो चाहेंगी कि आप कुछ समय अपनी सखियों के साथ गुज़ारें और ऐसे काम करें जो लड़कियाँ आम तौर पर करती हैं, जैसे अपने लिए कपड़े या जूते खरीदना. लड़के तो शॉपिंग से नफ़रत करते हैं, इसलिए आप यह काम अपनी सखियों के साथ कर लें. 

"जब आप अपने बॉयफ्रेंड के साथ बाहर जाती हैं तो ग़ौर कीजिए कि आपकी कौनसी बात उसे अच्छी लगती है, आपके कौनसे कपडे, आपकी लिपस्टिक का कौनसा शेड उसे पसंद है. उसके साथ बाहर जाते वक़्त उसीकी पसंद के अनुरूप श्रृंगार कीजिए. कुछ लड़के तो आपके लिपग्लॉस का स्वाद या गंध भी पसंद करेंगे. यदि आपके बॉयफ्रेंड को जींस पसंद हैं और वह चाहता है कि आप जींस पहनें, वह आपको तुरंत बता देगा. यदि आपकी स्कर्ट का लंबापन या छोटापन उसे अखरता है तो वह ज़रूर आपसे कहेगा. 

"अपने बॉयफ्रेंड के साथ जब आप किसी पार्टी में जाएँ तो जोंक की तरह उससे चिपटी न रहें. इससे आप 'पज़ेसिव' कहलाई जाएँगी. उसे अपनी पसंद की अन्य लड़कियों के साथ 'डांस' करने दें और आप भी अन्य लड़कों के साथ नाचें. बस, पार्टी का आख़िरी डांस यदि वह आपके साथ करे तो वही काफ़ी है. 

"आपका बॉयफ्रेंड तयशुदा वक़्त पर न आए या आने में उसे कुछ देर हो जाए तो तनिक भी नाराज़ न होइए. आख़िर वह भी एक इंसान है और इंसान गलतियाँ करता है. हो सकता है कि वह आपके पास आने के लिए तैयार हो रहा था कि उसी वक़्त उसकी जींस या पैंट का ज़िपर टूट गया और उसे दूसरे कपड़ों को इस्त्री करनी पड़ गई, जिसकी वजह से उसे आने में देरी हो गई. वह यह सब आपसे नहीं कहेगा, क्योंकि इसे वह अपनी मर्दाना शान के ख़िलाफ़ मानता है. 

"अपने बॉयफ्रेंड को उसकी सिगरेट पीने की आदत को लेकर परेशान न करें. यदि ऐसा करेंगी तो वह आपको छोड़कर किसी और से दोस्ती कर लेगा. जब आपका जन्मदिन आनेवाला हो तो धीरे से उससे कहिए, 'मेरे जन्मदिन का सबसे बढ़िया तोहफ़ा यही होगा कि मैं जिसे चाहती हूँ, वह सिगरेट पीना छोड़ दे.' अपने बॉयफ्रेंड की दाढ़ी या लम्बे बालों के बारे में भी यही नुस्ख़ा आज़मा सकती हैं. "

ऊपर-ऊपर से आधुनिक लगनेवाला यह लेख क्या लड़कियों को दक़ियानूसी बातें सिखाता-सा नहीं लगता?आख़िर वह यही तो कह रहा है कि अपने बॉयफ्रेंड के हर तरह के व्यवहार को सहें, संयम रखें. उससे कुछ कहना भी हो तो इस तरह से कहें कि वह नाराज़ न हो जाए. हाँ, उसकी पसंद का ख़्याल ज़रूर रखें और उसीकी पसंद के अनुरूप कपडे पहनें. यदि ऐसा न करेंगी तो वह आपको छोड़कर किसी और से दोस्ती कर लेगा. क्या यह सलाह उसी सीख की तर्ज़ पर नहीं है जो हमारे यहाँ लड़कियों को आम तौर पर बचपन से ही दी जाती है--जैसे शादी के बाद पति की हर इच्छा पूरी करो, वह चाहे कुछ भी कर ले, उफ़ तक न करो, उसीकी पसंद से पहनो-ओढ़ो, उसीकी पसंद का खाना पकाओ, उसकी कुछ बातें चाहें अच्छी न लगें, उन्हें नजरअंदाज कर जाओ, पतिव्रता बनी रहो--एक आदर्श पत्नी का यही धर्म है. 

और मज़े की बात तो यह है कि अपने आपको आधुनिक बतानेवाली, बम्बई जैसे महानगर से अँग्रेज़ी में प्रकाशित होनेवाली, उच्च और उच्च मध्यवर्गीय शिक्षित परिवारों में पढ़ी जानेवाली एक पत्रिका इस तरह की सामग्री परोस रही है. 

जहाँ यह पत्रिका यह मानकर चल रही है कि किशोरियों का बॉयफ्रेंड तो होना ही चाहिए, वहीं वह किशोरियों के मन में असुरक्षा की यह भावना भी पैदा कर रही है कि बॉयफ्रेंड को संभाल कर रखो वर्ना वह तुम्हें छोड़कर किसी और का हो जाएगा. 

यदि लड़कियों को पश्चिमी आधुनिकता से ही वाक़िफ़ कराना है तो उन्हें बताइए कि पश्चिमी लड़की का रवैया क्या होता है. पश्चिमी लड़की अपने निजत्व पर अपने बॉयफ्रेंड की पसंद को इतना हावी कभी भी नहीं होने देगी कि बस, बॉयफ्रेंड की रुचि के अनुसार ही सजे-धजे. इससे पहले कि उसका बॉयफ्रेंड उसे छोड़कर किसी और से दोस्ती कर ले, वह खुद ही बॉयफ्रेंड को छोड़ देगी. जहाँ पति-पत्नी का एक-दूसरे से सम्बन्ध-विच्छेद आम है, वहाँ बॉयफ्रेंड को छोड़ना कौनसी बड़ी बात है? ऐसा नहीं है कि रिश्तों की टूटन से उन्हें दुःख नहीं होता, लेकिन वहाँ इस तरह की बातों को ज़िंदगी का एक हिस्सा मानकर स्वीकार कर लिया गया है. 

लड़कियों को दब -झुक कर चलने की दक़ियानूसी सीख को आधुनिकता का चमचमाता मुलम्मा चढ़ाकर पेश करने की बजाय क्या यह अच्छा नहीं होगा कि लड़कियों को घर-परिवार और समाज में अपने अधिकारों के प्रति सजग किया जाए और बॉयफ्रेंड की चिंता छोड़ अपने लिए एक सच्चा मित्र तलाश करने की प्रेरणा दी जाए जो हो सकता है आगे जाकर जीवनसाथी बन जाए?

Tuesday, March 25, 2025

यादों के पिटारे से: मंगलसूत्र, बिंदिया और सिंदूर के बहाने

मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स के ५ जुलाई १९८९ के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था. ज़ाहिर है, इसमें जिन सामाजिक परिस्थितियों का उल्लेख हुआ है, उनमें और आज के हालात में काफ़ी अंतर है. इसलिए इसे उसी परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जाना चाहिए. अपने पुराने लेखों को अपने ब्लॉग पर संजो कर रखने के मेरे प्रयास की अगली कड़ी:


किसी पुरुष को देखकर क्या आप जान सकते हैं कि वह विवाहित है या नहीं? नहीं, क्योंकि विवाह के बाद पुरुष के रहन-सहन में या पहनावे में कोई अंतर नहीं आता. लेकिन विवाह के बाद महिला कई तरह के "सौभाग्यसूचक" चिन्हों से लाद दी जाती है. मसलन गले में मंगलसूत्र, कलाइयों में चूड़ियाँ, माथे पर बिंदिया, मॉंग में सिंदूर, पैरों में बिछिया-पायल आदि. पति की मृत्यु के बाद औरत के लिए इन चीज़ों का इस्तेमाल वर्ज्य हो जाता है. जबकि पत्नी की मृत्यु के बाद किसी पुरुष पर इस तरह का कोई प्रतिबंध नहीं लगता. 

हो सकता है कि कुछ महिलाएँ शौक से इन "सौभाग्यसूचक" चिन्हों का इस्तेमाल करती हों, तो कुछ सुन्दर और आकर्षक दिखने के लिए इनका सहारा लेती हों. कुछ यह सोचकर इन्हें अपनाती होंगी कि जब उनकी माँ, सास, नानी, दादी सभी ने यह किया है, तो उन्हें भी यही करना है. कुछ महिलाएँ समाज के डर से या इस डर से कि उन्होंने "सौभाग्यसूचक" चिन्ह नहीं पहने तो उनके पति का अनिष्ट होगा, इन्हें अपनाती होंगी. लेकिन इन सबसे हटकर जो औरतें इनकी अनिवार्यता के बारे में सवाल उठाती हैं, या इन्हें पहनने से इनकार करती हैं, वे आलोचना का शिकार बनती हैं. 

ऐसा नहीं है कि माथे पर बिंदिया लगाने से या गले में मंगलसूत्र पहनने से औरत को बड़ी भारी असुविधा होती हो. लेकिन उसे सोचने का मौका दिए बगैर, जब ये चीज़ें उस पर थोंप दी जाती हैं और उससे अपेक्षा की जाती है कि वह इन्हें दिन-रात, सोते-जागते अपने से अलग न करे, तो  ज़रूर कुछ असुविधा होती है. 

इस अनिवार्यता में से सवाल उठता है कि समाज में औरत की पहचान क्या सिर्फ़ अपने पति की वजह से होती है. यानी पति जीवित है तो पत्नी इन सौभाग्यसूचक अलंकरणों से सजी-धजी गुड़िया है और पति नहीं है तो इन सबसे विहीन बैरागिनी? इसी सिलसिले में एक घटना याद आ रही है. एक बुज़ुर्ग की ७५वीं वर्षगाँठ उनके बेटों-बहुओं ने बड़े ठाठ-बाठ से मनाई. इन बुज़ुर्ग की पत्नी को गुज़रे कई वर्ष हो चुके हैं. वर्षगाँठ के सिलसिले में कुछ धार्मिक रस्में अदा की गईं. इसके लिए एक पंडितजी बुलाए गए. जब इन बुज़ुर्ग ने पंडितजी के सामने अपना स्थान ग्रहण किया तो पंडितजी ने कहा, "श्रीमान, रस्म शुरू करने से पहले अपनी श्रीमतीजी को भी तो बुलाइए." इस पर वह बुज़ुर्ग जितने दुःखी और विचलित हुए वह तो सबने देखा. लेकिन शायद ही किसीने यह सोचा होगा कि ऐसी हालत में इनकी पत्नी यहाँ होती तो पंडितजी उन्हें अपने पति को बुलाने का आदेश नहीं देते क्योंकि उनकी वेषभूषा ही बता देती कि वह विधवा है.

महाराष्ट्र में किसी भी मुबारक़ मौक़े पर सौभाग्यवती महिलाएँ एक-दूसरे के माथे पर कुंकुम लगाती हैं. तीज-त्योहारों पर महिलाएँ अन्य सौभाग्यवती महिलाओं को अपने घर आमंत्रित करती हैं और तब भी कुंकुम का आदान-प्रदान होता है. दक्षिण भारत में भी ऐसी परम्परा है. पुराने ज़माने में जब औरतें घर से बाहर आती-जाती नहीं थीं, तब ऐसे मौक़ों के बहाने घर से बाहर निकलकर एक-दूसरे से मिल-जुल लेती थीं. लेकिन विधवाओं को ऐसे मौक़ों पर नहीं बुलाया जाता था और आज भी नहीं बुलाया जाता. बस, यही बात इस प्रथा की सारी अच्छाइयों पर पानी फेर देती है. क्या विधवाओं को अपनी हमउम्र स्त्रियों से मिलने-जुलने की या धार्मिक, सामाजिक आयोजनों में हिस्सा लेकर अपना मन बहलाने की ज़रूरत महसूस नहीं होती? पर ऐसे मौक़ों पर अलग रखकर उन्हें मानो बार-बार इस बात की याद दिलाई जाती है कि उनके पति जीवित नहीं हैं. इस तरह यदि उनके घावों पर लगातार नमक छिड़का जाता रहे तो वे अपने पति की मृत्यु के दुःख से कैसे उबर सकती हैं?

इसीलिए मंगलसूत्र पहनना या माँग में सिंदूर भरना बुरा नहीं है. बुरी हैं तो उनके साथ जुड़ी वे तमाम मान्यताएँ जो पति के जीवित या मृत होने के आधार पर औरत-औरत के बीच फ़र्क करती हैं. बुरे हैं तो वे प्रचलित विश्वास कि सौभाग्यसूचक चिन्ह धारण न करना अशुभ या अमंगल है. बुरी है तो वह आलोचना जिसकी शिकार अपनी इच्छा से सौभाग्यसूचक चिन्हों का त्याग करनेवाली सौभाग्यवती महिलाएँ होती हैं. 

औरत को औरत की तरह ही देखा जाना ज़रूरी है. पति के होने न होने से औरत की ओर देखने के नज़रिए में अंतर क्यों आना चाहिए? विधवाओं के केश काट देने की प्रथा जैसे धीरे-धीरे खत्म हुई है उसी तरह पति के जीवित रहते पत्नी द्वारा सौभाग्यसूचक चिन्हों के उपयोग और पति के मरने पर पत्नी द्वारा उन चिन्हों के त्याग को एक अनिवार्यता न बनाकर क्यों न इसे हर स्त्री की इच्छा पर छोड़ दिया जाए?

Thursday, September 26, 2019

छोटे पर्दे पर बड़े ख़्वाब!

हाल ही में "कौन बनेगा करोड़पति" (केबीसी) में हिस्सा लेनेवाली दो प्रतियोगियों ने बहुत प्रभावित किया. संयोग की बात है कि दोनों महिलाएँ थीं. पहली, बबिता ताड़े महाराष्ट्र के अमरावती के निकट एक कस्बे अंजनगाँव सुर्जी से हैं. बहुत ही हँसमुख, सौम्य व्यक्तित्ववाली बबिता एक सरकारी स्कूल में ४५० विद्यार्थियों के लिए दोपहर का भोजन बनाती हैं. उनके पति उसी स्कूल में चपरासी हैं. एक ख़ानसामा की बेटी बबिता अपनी स्वादिष्ट खिचड़ी के लिए बच्चों में ख़ासी लोकप्रिय हैं. घर की ज़िम्मेदारी में हाथ बँटाने के लिए उन्हें अपनी स्नातकोत्तर शिक्षा अधूरी ही छोड़नी पड़ी, लेकिन चूँकि पढ़ाई-लिखाई में उनकी दिलचस्पी है, जैसे मौका मिलता है वैसे वह किताबें,अख़बार आदि पढ़ लेती हैं. सामान्य ज्ञान की इसी पूँजी के सहारे वह केबीसी में शामिल होने आई थीं.

वैसे तो अमिताभ बच्चन अपने सामने बैठे हर प्रतियोगी को सहज बनाने की पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन फ़िर भी उनके जैसे महानायक का सामना करना आसान नहीं. बबिता न सिर्फ़ अपनी सादगी और शालीनता के साथ हॉट सीट पर टिकी रहीं, उन्होंने सारे सवालों के जवाब धैर्य और सूझबूझ के साथ दिए, और एक करोड़ रुपए जीत गईं.  एक करोड़ की रकम जीतने में सामान्य ज्ञान के साथ उनके संयत व्यवहार और सकारात्मक विचार का भी बहुत बड़ा योगदान रहा होगा. उन्होंने अपनी ज़िंदगी की मुश्किलों को बयान तो किया, लेकिन उनका रोना नहीं रोया.

कार्यक्रम के बीच अमिताभ बच्चन अक्सर पूछते हैं कि जीती हुई रकम का आप क्या करेंगे. बबिता की चाहत सिर्फ़ एक मोबाईल फ़ोन की थी. एक करोड़ जीतने के बाद जब बच्चन साहब ने उनसे कहा कि अब तो आपको काम करने की कोई ज़रुरत नहीं है, तो उनका जवाब था कि काम तो वह करती रहेंगी क्योंकि उन्हें अपने काम से प्यार है. निश्चय ही इस महिला ने एक करोड़ के साथ-साथ दर्शकों का मन भी जीत लिया होगा. न उनमें अपनी आर्थिक स्थिति को लेकर कोई हीन भावना दिखी, और न ही अपने काम को लेकर किसी कमतरी का अहसास. अपने काम के प्रति समर्पण की भावना और स्कूल के बच्चों के प्रति उनके स्नेह को देखकर दर्शकों को भी उनकी सकारात्मकता ने छू लिया.

माना कि इतने बड़े रियलिटी शो में शिरकत करने वालों को कैमरे के सामने पेश करने से पहले कई तरह की सूचनाएँ दी जाती होंगी, उनकी छवि को तराशा जाता होगा, और जनता के सामने प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत होने के लिए उन्हें कुछ गुर सिखाए जाते होंगे. बावजूद इसके बबिता की स्वाभाविक सादगी छुप न सकी. साथ ही अमिताभ बच्चन आज जिस मक़ाम पर हैं, वहाँ से उनका आम जनता के साथ उठना-बैठना, सभी प्रतियोगियों के साथ आदरपूर्ण और मित्रवत व्यवहार, हँसी-मज़ाक करना, और सुपरस्टार की छवि के बोझ से मुक्त होकर सबके साथ सामान्य आचरण करना आदि इस शो को महज प्रश्नोत्तरी का कार्यक्रम नहीं, आपसी संवाद को रेखांकित करती एक मानवीय गतिविधि बना देते है.

इसी सन्दर्भ में जिनका ज़िक्र किया जा सकता है ऐसी दूसरी महिला हैं रूमा देवी. यह विशेष कार्यक्रम कर्मवीर में अतिथि बनकर आई थीं. राजस्थान के बाड़मेर ज़िले की रहनेवाली रूमा देवी को हस्तकला के क्षेत्र में उत्कृष्ट काम करने के लिए इस वर्ष राष्ट्रपति ने "नारी शक्ति पुरस्कार" से नवाज़ा है. टीवी के पर्दे पर इनकी उपस्थिति बेहद दिलकश और ऊर्जावान थी. पारम्परिक राजस्थानी पोशाक में सजीं रूमा देवी ने खुलेपन और आत्मविश्वास के साथ अपनी कहानी सुनाई. वह महज आठवीं कक्षा तक स्कूल गईं. कम उम्र में शादी होने के बाद धन के अभाव में अपने छोटे बच्चे का इलाज नहीं करा पाईं और उसे खो दिया. घूँघट की प्रथा का आदर करते हुए उन्होंने अपनी दादी से सीखा हुआ कशीदाकारी का काम घर से ही शुरू किया और धीरे-धीरे अपने जैसी कई महिलाओं को अपने साथ जोड़कर उन्हें भी रोज़गार दिलाया. आज २२ हज़ार महिलाएँ उनके साथ कार्यरत हैं. उनके बनाए वस्त्र और अन्य सामान जैसे टेबल कवर, कुशन कवर आदि की भारत में और विदेश में भी बहुत माँग है. 

रूमा देवी ने अपने काम के सिलसिले में विदेश दौरे भी किए हैं, और व्यावसायिक मॉडेल्स के साथ फैशन शो में रैम्प वॉक भी. केबीसी के विशेष कार्यक्रम के दौरान वह लगातार मुस्कुरा रही थीं और बेबाकी से ठहाके भी लगा रही थीं. अतिथि के रूप में उनका साथ देने आई थीं अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा. सोनाक्षी के ग्लैमर और चमक-दमक के सामने रूमा देवी कहीं भी कम नहीं लग रही थीं, बल्कि महज ३० वर्ष की उम्र में हासिल की उपलब्धियों की रोशनी में उनका आकर्षक व्यक्तित्व और भी निखर उठा था. उन्होंने १२ लाख ५० हज़ार की रकम जीती और उसे अपने साथ काम करती महिलाओं के उत्थान के लिए इस्तेमाल करने की इच्छा जताई.

गाँव की मिट्टी की खुशबू अपने साथ लेकर आईं बबिता और रूमा देवी की कहानियाँ प्रेरणादायी तो हैं ही, साथ ही यह दूर-दराज क्षेत्रों में बसे उन अनगिनत लोगों को सपने देखने की हिम्मत देती हैं जो अपनी मेहनत, कौशल और विश्वास के बूते पर अपने आपको साबित करने के लिए प्रयत्नरत हैं. 

यह लेख इन्दौर से प्रकाशित दैनिक "प्रजातंत्र" में आज २६ सितम्बर २०१९ के अंक में प्रकाशित हुआ है. 

Saturday, January 8, 2011

The Saree Saga

Time was when all married women were seen in sarees, at least in my part of the world. The training to wear a saree began earlier. The wedding of a close friend or a relative was a good occasion for all young, unmarried women to flaunt their six yards of splendour. These gatherings provided an excuse for prospective grooms and their families to 'see' girls / women of marriageable age in a natural setting without making them self-conscious. So it was almost an unwritten rule that young women wear sarees at others' weddings. Those who tried to deviate from this path by wanting to wear something else were sternly admonished: You'll be getting married soon, what will your in-laws think if you can't wear a saree properly.


Most of the leading ladies in Hindi movies danced around the trees dressed in opulent sarees, with their hair tied in ridiculously high bouffants. How they managed to lip-sync to a song, respond coyly to the hero's advances, prance about in high heels and look as if they were enjoying the whole exercise is anyone's guess. Jokes apart, saree is not an easy wear when it comes to doing several chores. As women discovered the ease with which they could do many things wearing a salwar-kameez or a pair of jeans and a top, they began relegating the saree to the back shelf. Salwar-kameez and its variants took over as the most popular costume for women across the country.

The humble saree was lying low for some time before it made a spectacular comeback. Not being a stitched garment, it is very versatile and can be draped in hundreds of different ways. And when some intelligent designer had the bright idea of giving a whole new glamorous look to the blouse, women started using the saree to make bold fashion statements. As the blouse went from being small to almost non-existent, the stature of saree as a stylish attire rose higher and higher. The birth of designer sarees opened unlimited opportunities. Once a traditional piece of clothing, the saree has become cool and happening. But fashion trends are always mercurial, so there's no telling where the saree will go from here.