Tuesday, July 21, 2026

यादों के पिटारे से: एक मेहमान फूल के अनेक रंग

मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स के परिशिष्ट इंद्रधनुष में ४ सितम्बर, १९९३ को प्रकाशित हुआ था. 

हॉलैण्ड के पश्चिमी तट के पास एक छोटा-सा क़स्बा है --लिस्से. इसी क़स्बे में बसा है क्यूकेनहॉफ़. क्यूकेनहॉफ़ वसंत ऋतु के सिर्फ़ दो महीनों में सैलानियों और पुष्पप्रेमियों के लिए खुला रहनेवाला एक सुन्दर उद्यान है. हॉलैण्ड  में वसंत की शुरुआत मार्च के अंतिम दिनों में या अप्रैल के पहले हफ़्ते में होती है. और अप्रैल के महीने में ही खिलता है ट्यूलिप जिसके लिए हॉलैण्ड दुनिया भर में मशहूर है. अपने-आप में बेहद खूबसूरती संजोए ट्यूलिप के फूल पूरे साल में सिर्फ़ महीने-डेढ़ महीने ही खिलते हैं. क्यूकेनहॉफ़  में ट्यूलिप की ७०-८० क़िस्में अपने पूरे शबाब पर होती हैं और उन्हें देखने के लिए देश-विदेश से हजारों पर्यटक लिस्से आते हैं. इस उद्यान में इन्हीं दिनों में अन्य कई तरह के फूल भी खिलते हैं लेकिन ट्यूलिप के अद्भुत आकर्षण के सामने उनका सौंदर्य कुछ फ़ीका -सा लगता है.

क्यूकेनहॉफ़  ७० एकड़ क्षेत्र का एक विशाल उद्यान है. क्यारियों में रंग-बिरंगे ट्यूलिप इतने कलात्मक ढंग से उगाए जाते हैं कि तरह-तरह के रंगों के वर्ग या आयत दूर तक फैले हुए दिखाई पड़ते हैं. ट्यूलिप अपने डंठल पर बिलकुल सीधा खड़ा रहता है और ये डंठल एक-दूसरे से एकदम सटे हुए होते हैं इसलिए एक ही तरह के सौ-दो सौ या उससे भी ज़्यादा फूल हमेशा एक साथ खड़े दिखाई देते हैं. 

अन्य सभी फूलों की तरह ट्यूलिप का फूल भी सबसे ज़्यादा सुन्दर तब लगता है जब वह अधखिला होता है. कभी उसकी पंखुड़ियां सिर्फ़ एक रंग की होती हैं, तो कभी दो या तीन रंगों की. कभी पंखुड़ी लाल हुई तो उसके किनारे सफ़ेद होते हैं, कभी पीली पंखुड़ी पर बीचोंबीच बड़ा-सा लाल निशान ऐसे दिखता है जैसे किसीने  अपने अंगूठे से लम्बा लाल तिलक लगा दिया हो, तो कभी सफ़ेद रंग की पंखुड़ी पर केसरिया रंग की ऐसी बौछार होती है जैसे किसीने हाथ में तूलिका लेकर मनचाहे ढंग से छिटक दी हो. और फ़िर पचासों अलग-अलग रंग संयोजन और हर रंग की इतनी भिन्न छटाएँ कि उनके नाम किसी भी भाषा के शब्दकोष में न हों. पंखुड़ियों के किनारे कभी गोल तो कभी ऊपर से नुकीले तो कभी इतनी बारीकी और सफ़ाई से कटे हुए मानो किसी ने झालर लगा दी हो. प्रकृति का यह चमत्कार जब इतनी विविधता लिए हजारों-लाखों फूलों के रूप में हमारे सामने आता है तो सृष्टि के रचयिता के प्रति मन आस्था से भर उठता है. 



हॉलैण्ड में बारिश का कोई मौसम नहीं होता. साल भर थोड़ी-थोड़ी बारिश होती रहती है. लेकिन बारिश के बावजूद क्यूकेनहॉफ़ का लुत्फ़ उठाने आए लोगों का उत्साह ख़त्म नहीं होता. हजारों की संख्या में लोग सर्द हवा के थपेड़ों को सहते अपनी छतरियों और रेनकोटों को संभालते इस "ट्यूलिप तीर्थ" की यात्रा करने आते हैं. 

क्यूकेनहॉफ़ के आसपास के इलाके में ट्यूलिप के कई खेत हैं जहाँ ट्यूलिप की बाकायदा खेती होती है. पूरा खेत दूर से ऐसे दिखता है मानो किसीने रंगबिरंगा विशाल गलीचा बिछाया हो -- एक के बाद एक अलग-अलग रंग की सीधी पट्टियों वाला विशाल गलीचा। आज हॉलैण्ड में ४० हजार एकड़ भूमि पर ट्यूलिप की खेती होती है. हॉलैण्ड से बड़ी मात्रा में ट्यूलिप के फूलों और कंदों का निर्यात होता है. साल में सिर्फ़ महीना-डेढ़ महीना खिलने के बावजूद ट्यूलिप आज एक बड़ा उद्योग बन गया है. हॉलैण्ड की जलवायु ट्यूलिप के खिलने के लिए उपयुक्त तो है ही, वहाँ के निवासियों ने अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में ट्यूलिप के महत्त्व को पहचाना है, और वे ट्यूलिप के विकास में लगे हुए हैं. 

हॉलैण्ड में ट्यूलिप हमेशा कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में दिख ही जाता है. वहाँ कभी छातों के हैण्डल ट्यूलिप के आकार में बने होते हैं तो कभी पुरुषों की "टाईज " ट्यूलिप के प्रिंट से सजी होती हैं. यहाँ तक कि हॉलैण्ड का राष्ट्रीय पेय "येनेवर " जिस विशेष गिलास में पिया जाता है, उसका आकार ट्यूलिप से प्रेरणा लेकर डिजाइन किया गया है. 

ट्यूलिप की एक ख़ासियत है. जिस तरह अन्य फूलों के आकार या रंग संकरण से बदले जा सकते हैं, ट्यूलिप में यह प्रक्रिया अचानक, अपने-आप हो जाती है. ट्यूलिप उगानेवाले भी नहीं जानते कि उनके बोए कंदों में से कौनसा कंद एक नई क़िस्म के फूल को जन्म देगा, जिसका रंग और पंखुड़ियों का आकार ट्यूलिप की अन्य क़िस्मों से बिलकुल भिन्न होगा. इस नए ट्यूलिप से जितने कंद निकलते हैं, वे भी बिलकुल नए ट्यूलिप की ही तरह के फूलों को जन्म देते हैं. 

अब वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि ट्यूलिप में बदलाव की यह प्रक्रिया "वाइरल संक्रमण" के कारण होती है लेकिन १७वीं सदी में तो इसे "चमत्कार" ही माना गया था और  ट्यूलिप-उत्पादक सैंकड़ों कंद इकट्ठा कर इस बात का इंतज़ार करते रहते थे कि कब उनमें से नई क़िस्म का फूल खिलेगा. 

इसी वाइरल संक्रमण का नतीजा है कि आज ट्यूलिप इतनी भिन्न-भिन्न क़िस्मों में खिलता है. भविष्य में भी इसकी नई क़िस्मों के रूप में पुष्पप्रेमियों को प्रकृति का अनोखा उपहार मिलता रहेगा.

Monday, May 4, 2026

यादों के पिटारे से: तीसरे मुल्क में "अपना आदमी"

मेरा यह लेख १९ अगस्त १९९३ को नई दिल्ली से प्रकाशित नवभारत टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था. 

लंदन के जिस होटल में हम ठहरे थे, वहाँ सुबह का नाश्ता परोसने वाले चुस्त-दुरुस्त युवक-युवतियों में से एक युवक हमारे पास आकर हमसे हिंदी में बतियाने लगा. युवक गोरा-चिट्टा था और दूसरे ग्राहकों के साथ एकदम किसी अंग्रेज़ की तरह अंग्रेज़ी बोल रहा था. यदि वह स्वयं आकर हमारे साथ हिंदी में न बोलता, तो मैं भी शायद कभी जान न पाती कि वह भारतीय मूल का है. पहले एक-दो दिन तो बातें "इंडिया के क्या हाल हैं?", "अभी तो बहुत गर्मी होगी " तक ही सीमित रहीं. युवक बड़े अपनेपन से "इंडिया" के बारे में बातें करता और बड़े प्यार से हमें खाना परोसता। उसकी बातचीत के लहजे से मुझे लगा कि वह पंजाब से होगा. धीरे-धीरे वह अपने बारे में बताने लगा. उसने बताया कि वह पिछले पंद्रह साल से लंदन में रह रहा है और इन दिनों क़ानून की पढ़ाई कर रहा है. गर्मी में कॉलेज बंद है, इसलिए वह वेटर का काम करता है, वर्ना हमेशा वह यह काम नहीं करता. मैंने उससे यों ही पूछ लिया कि वह कहाँ से है. उसने बताया कि वह पाकिस्तान से है. हमने जब बताया कि हम दिल्ली में रहते हैं, तो वह काफ़ी उत्तेजित होकर कहने लगा कि उसके वालिद दिल्ली में रह चुके हैं, बड़ी ख़ूबसूरत जगह है, लेकिन वह कभी नहीं गया. 

इंग्लैंड में बसे भारतीयों के बारे में बात चली तो उसने बताया, "यह होटल भी तो हमारे लोगों का है. वही मेजर शेयर होल्डर हैं इसके. " वह काफ़ी नीची आवाज़ में बोल रहा था और उस समय रेस्तराँ में शोर कुछ अधिक हो रहा था, इसलिए मैं उसकी बात साफ़-साफ़ सुन न सकी. जब मैंने उससे अपनी बात दोहराने की विनती की तो वह एकदम सम्भल कर बोला ," आपके लोगों का ही है यह होटल. वही मालिक हैं इसके." और फिर उसने कोई भारतीय नाम बताया. हालाँकि मैं पहले उसकी बात ठीक से सुन न सकी थी, फिर भी मैंने ग़ौर किया कि जहाँ पहले उसने "हमारे लोग" कहा था, वहीँ बाद में "आपके लोग" कहा. शायद उसने सोचा होगा कि मैं उसके भारतीयों को "हमारे लोग" कहने पर आपत्ति कर रही थी, जबकि ऐसा बिलकुल नहीं था, मैं तो उसकी इस बात से बहुत खुश हुई थी. जिस प्यार और अपनेपन से वह हमारे साथ पेश आया था, वह मुझे हमेशा याद रहेगा. 

दूसरी घटना, हम लोग हॉलैंड में थे. रॉटरडॅम शहर से कुछ ही दूर दो सौ-ढाई सौ साल पुरानी पवन चक्कियाँ डच लोगों ने अभी तक सहेज कर रखी हैं, जिन्हें देखने रोज़ कई पर्यटक आते हैं. जगह का नाम है किंडरडाइक.  वहाँ मुझे अपने बेटे के साथ हिंदी में बात करते सुनकर एक महिला हमारे पास आई. उम्र साठ के आसपास होगी. काफ़ी महंगे दिखने वाले कपड़े की सलवार-कमीज़ पहने दुपट्टे से सर ढके वह महिला किसी संभ्रांत परिवार की लग रही थी. बातचीत के दौरान पता चला कि वह पाकिस्तान से है. लेकिन पिछले कई सालों से अपने बेटों के साथ पेरिस में रह रही है. उसका एक बेटा रॉटरडॅम में रहता था, जिसके पास वह उन दिनों आई हुई थी. जब मैंने बताया कि मैं दिल्ली से आई हूँ, तो वह ऐसे प्रसन्न हुई, जैसे बरसों बाद आत्मीय जन मिलने पर कोई होता है. वह पुरानी दिल्ली के उन गली-मुहल्लों के नाम बताने लगी, जहाँ से उसकी शादी हुई थी और जहाँ उसने अपनी गृहस्थी पहली बार बसाई थी. उसने अपने पति और बेटे से भी हमारा परिचय करवाया और पूछा कि रॉटरडॅम वापस जाने के लिए हमारे पास कोई साधन है, वर्ना वह अपने बेटे की कार में हमें अपने घर ले जाएगी और खाना खिलाकर हमें हमारे फ्लैट भेजेगी. मैं उसके इस प्रस्ताव से अभिभूत थी. 

तीसरी घटना रॉटरडॅम की ही है. कुछ दालें और मसाले खरीदने के लिए हम एक दुकान में गए थे. पश्चिमी यूरोप और अमेरिका के करीब हर बड़े शहर में इस तरह की दुकानें हैं, जहाँ भारतीय भोजन बनाने में उपयोग की जाने वाली  खाद्य-सामग्री मिलती है. ऐसी दुकानों के मालिक अक्सर भारतीय ही होते हैं. बहरहाल, इस दुकान के मालिक हमसे बातचीत करने लगे. जनाब पाकिस्तान से थे. हमने बताया कि हम लोग तो कुछ ही महीनों के लिए आए हैं--मेरे पति इरास्मस विश्वविद्यालय में अतिथि प्राध्यापक के रूप में गए थे. जब उन सज्जन ने यह सुना तो वह गदगद हो गए. कहने लगे, "कितने फ़ख़्र की बात है कि हमारे लोगों में से कोई आकर इन लोगों को गणित पढ़ाए. "

पश्चिमी मुल्कों में मिले ये तीनों पाकिस्तानी --जिनका मैं नाम तक नहीं जानती--जिस तरह से पेश आए, उसमें यात्रा में मिले अजनबियों के साथ आमतौर पर किए जाने वाले सामान्य व्यवहार से कुछ अतिरिक्त था...कुछ अतिरिक्त ऊष्मा, अतिरिक्त नज़दीकी, अतिरिक्त अपनापन. हर बार मैं सोचती, इन लोगों से यदि मैं भारत में या पाकिस्तान में मिलती तो क्या हम इसी तरह से मिलते? तीसरे मुल्क में जाकर जहाँ एक पाकिस्तानी एक भारतीय को "अपना आदमी" समझने लगता है, वहीं अपने-अपने घर जाकर दोनों के बीच एक दीवार क्यों खड़ी हो जाती है? 

Saturday, March 14, 2026

At The Spectacular Rani Ki Vav!

It is a beautiful morning. We set out from Ahmedabad by taxi. Our destination is the famed 11th-century stepwell Rani Ki Vav on the banks of the river Saraswati in Patan district about 125 kilometres away. Stepwells were built in arid regions like Gujarat and Rajasthan as a source of water for the local population and travellers. Being underground, they were cooler, providing respite from the harsh sun. Occasionally they were used as venues for gathering and celebrating festivals.


The road from Ahmedabad is comfortable and we reach in about two-and-a-half hours. We enter the premises after buying our tickets (Rs. 25 for Indians and Rs. 300 for foreigners). The well is situated amidst sprawling lawns that are well-maintained and very green. 


The stepwell is believed to have been commissioned by queen Udayamati in the memory of her husband Bhima I of the Chaulukya (also known as Solanki) dynasty in 1063. Its construction took 20 years. Some records show that it was made around 1032. It is certain that the stepwell was constructed about a thousand years ago. It is elaborately decorated with stunning sculptures and is seven floors deep, earning a moniker of "Inverted Temple" for itself. 

At some point in time, the stepwell was flooded by the river Saraswati and silted over. It is not known for how long the well remained hidden underground, perhaps for some centuries. It was noticed during excavations carried out in the 1940s. The Archaelogical Survey of India (ASI) restored it in the 1980s. Now it is protected by the ASI and is one of the UNESCO World Heritage Sites in India.


A bit overwhelmed by the size of the huge stepwell, I start descending it. Wearing comfortable shoes is a must. The stairs are somewhat tricky and require taking firm steps with full attention. There are no handrails or supports, so one has to be slow and steady. At every level, there is a wide platform to stand and admire the sculptures around you before climbing down to a lower level. You cannot go all the way down to the water level. The access is closed for the last two levels or so.


As you go down, it gets cooler and more pleasant. The hats and sunglasses come off as the stepwell turns into a comfortable retreat. The pillars, beams and walls are adorned with numerous carvings. They depict Gods and Goddesses in their traditional forms as described in the epics, animals, flowers, scenes from daily life and geometrical patterns. The proportions, postures and facial expressions in the sandstone sculptures tell us a lot about the sculptors' excellence in their craft. And the sturdy structure of the stepwell is a testimony to the architectural mastery of builders of that time. It withstood the silt, clay and sand that the floods deposited inside it for centuries!



Some panels in Rani Ki Vav feature intricate geometrical designs. The patterns in the well-known patola sarees that are woven in this region are inspired by these designs. Isn't it amazing? 

Photos by Lata

One of the several panels with exquisite carving! If queen Udayamati built Rani Ki Vav, her husband Bhima I constructed the Sun Temple at Modhera a few kilometres away. Read about it here.

Incidentally, the Rs.100 currency note features Rani Ki Vav on the reverse side.

Thursday, March 12, 2026

Revering The Sun At Modhera!

Modhera Sun Temple lies at a distance of about 100 kilometres from Ahmedabad in Gujarat. Situated in Mehsana district, the temple was built a 1,000-years ago by Bhima I of the Chaulukya (also known as Solanki) dynasty. It is not used for worship anymore. Now it is a protected monument, managed by the Archaeological Survey of India. I was highly impressed with its grandeur and beauty when I visited it recently. There are trains and buses to reach Modhera from Ahmedabad. One can also use a taxi which takes about two-and-a-half hours. 


There is an entry ticket for Rs. 25 per person to enter the temple complex. The premises are well-maintained with greenery and landscaping. There is a museum inside the complex. The path to the museum is bordered by several sculptures that were excavated from this location. Inside, the museum houses more such sculptures that represent the Maru-Gurjara style from the 11th century.


The temple is a short walk away from the museum. It comprises three separate parts: a stepped reservoir (kunda), an outer assembly hall (sabhamandapa or rangamandapa), and the innermost sanctum (garbhagriha) situated inside a hall (gudhamandapa). All the structures feature intricate carvings on their walls, pillars and ceilings. The figures in the carvings are derived from epics such as Ramayana or Mahabharata. Also, there are images of other Gods and Goddesses, animals, floral motifs, geometrical patterns and scenes from daily life. 


The garbhagriha is vacant and locked now, but at one time it housed an idol. The temple is designed in such a way that the first rays of the sun illuminate the sanctum during solar equinoxes. And when it is the summer solstice, the rays touch the first step of the kunda at sunrise, while at noon the sun is directly above the temple so there is no shadow.  It is amazing to see how architecture and astronomy were used together to worship Sun a thousand years ago.


The walls are chock-a block with awesome art. My guide pointed out several panels depicting well-known instances from epics. I might have missed them if it was not for him. Sometimes a particular sculpture may get overshadowed by surrounding sculptures, at other times it could be placed high up on the wall making it difficult to see it properly. I recommend hiring a certified guide to understand and appreciate the beauty of this awesome monument.


This is one of the many images of the Sun God at the Modhera Sun Temple. The Sun is depicted in a standing position in his chariot that is drawn by seven horses.

Photos by Lata
If the visit to the temple was very fulfilling, the light and sound show in the evening was the icing on the cake! The commentary was well-researched and informative. And the lights projected on the monument in different hues were mesmerising. It was a memorable audio-visual experience. A board in the temple complex described it as the "First Solar Powered 3D Projection Mapping Show & Heritage Lighting On Modhera Sun Temple". 

A temple erected to honour the Sun God featuring a show powered by solar energy...what could be more fitting than this! When the bit about solar power was mentioned in the commentary at the end of the show, the audience applauded in appreciation.

Wednesday, March 4, 2026

A Scrapbook Of Photos From Ahmedabad!

Here are some pictures from my recent visit to Ahmedabad. They say, a picture is worth a thousand words, so I will let the pictures do most of the talking. However, I am adding a few words to each picture to give it some context, and to make it relevant and more meaningful.

Atal Bridge runs across the Sabarmati River, occupying a pride of place along the Sabarmati Riverfront. Meant only for pedestrians, this is 300 metres long. Inaugurated in 2022, its design is inspired by kites underlining the importance of Uttarayan, or Kite Festival celebrated in Ahmedabad every year in January. I enjoyed crisscrossing the bridge on foot. I visited it in the early evening. Missed out on the illuminations that make it look like a sparkling necklace once it gets dark.


This store was more like a warehouse! Crammed with food products from floor to ceiling, it offered a variety of dry sweets and savouries--farsan in Gujarati--, that Gujarat is famous for. I ended up picking up more than I had planned for.


These little charkhas look neat, don't they? And surely they could not have been on display in a better location! Their vendor has laid them out for customers just outside the Sabarmati Ashram. 


Historic Bhadra Fort built in 1411 by Sultan Ahmad Shah in the walled city of Ahmedabad. The much revered Bhadrakali Temple is situated in this complex. The fort functioned as a royal court and a British prison.


Bhadrakali Temple in the early morning sun with the turrets of the fort in the background. I happened to visit it on a Tuesday, a special day for worshipping the Goddess. A group of people was busy singing bhajans to the accompaniment of musical instruments. The atmosphere was festive as the temple was getting ready to celebrate the 615th foundation day of the city of Ahmedabad. 


A stall inside the temple selling flowers, coconuts and red chunaris that visitors buy as an offering to the Goddess. 


The imposing Bhadra Fort. It was not possible to capture both the turrets in the picture.


This amazing gateway stands tall in the walled city. A relic from the past connecting the present with yesteryear.


This is Tankshal-ni-Haveli situated in a narrow and busy lane. This area housed the coin mint in olden days. The haveli was probably built in the 1800s. It features stunning woodcarvings. It was converted into a girls' school in 1925, but has been in disuse for a long time now. Passersby and residents are unaware of the importance of this structure and it is a pity to see it stand amidst the chaotic environment of its surroundings.


The fine carving on the upper floor of the haveli!


Mannequins in the cramped lanes of Ratan Pol. This is a bustling market selling fabrics and garments. 

Photos by Lata

I chanced upon this group of women dressed in their finery inside the Adalaj stepwell. Their bright attire provided an interesting contrast to the light coloured backdrop. At the same time the reds and pinks in the foreground accentuated the beauty of the exquisite setting.

Monday, March 2, 2026

Adalaj Stepwell: A Marvel In Sandstone!

Stepwells ( vav in Gujarati and baoli, bawdi in Hindi) have been a part of arid regions like Gujarat and Rajasthan for many centuries. Some were used as luxurious baths by the royalty, while others provided water to the travellers and local residents for their daily needs. They also served as gathering spaces where people got together for social and religious events. Very often, they were large structures, several floors deep, with ornate carvings.

I got an opportunity to visit one of the very beautiful stepwells in Gujarat recently. Situated in Adalaj near Gandhinagar, it is a five-storeyed sandstone structure built in 1498. Called Adalaj Stepwell or Roodabai Stepwell, it is a popular tourist spot easily accessible from Gandhinagar and Ahmedabad at a distance of about five and 18 kilometres respectively.

It is hard to tell from the outside that this is the site of such an important heritage structure. The surroundings are dusty and ordinary, just like one would find in a small town. As you enter the premises, there is a ticket window (Rs. 25 for Indian visitors and Rs. 300 for foreign tourists). Done with the ticket, you walk to the area where steps lead you down towards the bottom of the well. The well is completely covered, but for a circular opening above the water body.

The steps are in good shape and easy to use. I start climbing down, stopping on each floor to appreciate the carvings. There are deities, human figures, elephants, geometrical designs, trees, flowers on the walls and the pillars...all of them exquisite in their proportions and symmetry. The sheer scale of the intricate art fills you with awe and amazement. One can climb down almost to the level of the water which stands in a rectangular pool. It gets a bit dark and cooler as you go down, a welcome respite from the bright sun and warm temperatures outside. 


It is a pleasant morning and visitors are trickling in continuously. I meet two large groups of pre-teen school students, led by their teachers. They bring a lot of colour and positive energy to the ancient monument. Tourist guides are at work pointing towards significant carvings, and doubling up as photographers capturing their clients' images against the magnificent backdrop. Soon, the images will find their way to different social media platforms!

I find a nice spot on one of the steps and soak in the ambience. I recall the poignant story behind the making of this well. 

Photos by Lata
The story goes that Rana Veer Singh of the Vaghela dynasty ruled this area in the 15th century. It was a dry region and his subjects often faced water scarcity. As a helping gesture to them, he took up the construction of this stepwell. But as luck would have it, he got killed in a battle with Mahmud Begada, the Sultan of a neighbouring kingdom before the stepwell was completed. The Rana's wife Roodabai (also known as Roopba) wished to commit sati, but Begada, who was attracted to her beauty, stopped her from committing sati and proposed to her. She agreed to his proposal on the condition that he would complete the construction of the stepwell. Begada readily took up the project and brought it to its completion. Perhaps this explains the fusion of Hindu and Islamic styles in its making. Roodabai, satisfied that her husband's wish got fulfilled, jumped into the same well and ended her life. 

The story gets sadder with the account of Begada killing the masons who made this stepwell. It is said that he did not want them to make something as wonderous as this well so he sentenced them to death. One can see their graves in the premises. They did not live, but their creation continues to live in all its grandeur and splendour.

Wednesday, October 29, 2025

यादों के पिटारे से: परंपरा के पुल पर एक यात्री

अमेरिकी सितारवादक स्कॉट मार्कस के साथ मेरी यह बातचीत नवभारत टाइम्स के २० मार्च, १९९३ के अंक में प्रकाशित हुई थी. कई साल गुज़र गए. हाल ही में स्कॉट के बारे में गूगल पर ढूँढ़ने पर पता चला कि वह सांता बारबरा स्थित युनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया के संगीत विभाग में अब भी कार्यरत हैं. २०२१ में आयोजित उनके सितारवादन का कार्यक्रम यूट्यूब पर उपलब्ध है. 

सांता बारबरा स्थित युनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया के विभिन्न भागों में पढ़ रहे भारतीय छात्र पिछले दिनों एक शाम इकट्ठे हुए थे. नया शैक्षिक साल अभी-अभी ही शुरू हुआ था. कुछ नए छात्र थे, जो पहली बार ही अन्य भारतीय छात्रों से मिल रहे थे. ऐसी शामें अक्सर एक-दूसरे से बतियाने और खाने-पीने में ही गुज़रती हैं. पर उस दिन बतियाने और खाने-पीने के बाद सितारवादन का एक कार्यक्रम हुआ. सितारवादक थे डॉ. स्कॉट मार्कस. ३९ - वर्षीय स्कॉट इसी विश्वविद्यालय के संगीत विभाग में प्रोफ़ेसर हैं. पता चला कि स्कॉट बहुत अच्छी हिंदी बोलते हैं. उनके पास जाकर मैंने सीधे हिंदी में ही बात करनी शुरू की और पाया कि स्कॉट वाक़ई अच्छी हिंदी बोलते हैं. उनसे और बातें करने का मन हुआ और एक दिन उनके साथ उनके ऑफ़िस में काफ़ी लम्बी बातचीत हुई. स्कॉट सिर्फ़ एक अच्छे सितारवादक ही नहीं, एक दिलचस्प इंसान भी हैं. वह क़रीब चार साल बनारस में रहे हैं--किसी पाँच -सितारा होटल में नहीं, बल्कि एक आम हिंदुस्तानी की तरह. स्कॉट गाँवों में गए, वहाँ घूमे, कुछ दिन रहे भी, नौटंकी देखी, रामलीला देखी और सितार बजाना सीखते रहे. बनारस के घाट उन्हें बहुत सुन्दर लगे. "गंगा माँ के पास बहुत शांति है"--वह कहते हैं. स्कॉट ने कुछ समय काहिरा में रहकर मध्य-पूर्व का वाद्य 'ऊद ' बजाना भी सीखा. वह मध्य-पूर्वी शैली में बाँसुरी भी बजाते हैं. अरबी भी उन्हें आती है. 

स्कॉट के कक्ष में प्रवेश करते ही सामने की दीवार पर राधा-कृष्ण का एक बड़ा-सा चित्र टंगा हुआ है. स्कॉट ने बताया कि वह दरअसल नौटंकी का एक परदा है. वीणावादिनी सरस्वती के दो चित्र भी हैं. एक जगह क़ाबा के चित्र के साथ एक अरबी कैलेंडर टंगा हुआ है.

आख़िर सितार में स्कॉट की दिलचस्पी हुई कैसे? स्कॉट ने बताया कि क़रीब बीस साल पहले जब वे वेस्लेयन विश्वविद्यालय, कनेक्टीकट में पहले वर्ष के छात्र थे तब संगीत या मानव-विज्ञान पढ़ने की उनकी इच्छा थी. उस  विश्वविद्यालय में कई देशों का संगीत सीखने की सुविधा थी. एक दिन एक कमरे के सामने से गुज़रते हुए स्कॉट को सितार के सुर सुनाई दिए. सुरों ने स्कॉट को आकर्षित किया और वह वहीं रुक कर सुनने लगे. सितारवादक ने स्कॉट को देखा तो उन्हें अंदर बुला लिया और स्वयं फ़िर सितार बजाने लगे. सितारवादक थे प्रोफ़ेसर रामदास चक्रवर्ती और वह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से अतिथि प्रोफ़ेसर के रूप में वेस्लेयन विश्वविद्यालय आए थे. स्कॉट बताते हैं, "राम बहुत फ्रेंडली थे, एकदम मस्त." सितार के सुरों ने तो स्कॉट को बाँधा ही था, रामदास चक्रवर्ती के दोस्ताना व्यवहार ने भी उन्हें आकर्षित किया. स्कॉट अपनी अंगुली पर लगा मिज़राब दिखाते हुए कहते हैं, "उन्होंने मिज़राब दिया था, तब से ही हाथ में है. मैं राम चक्रवर्ती से सितार सीखने लगा. "

मैंने पूछा , "फ़िर भारत जाने का मन कैसे हुआ?" 

स्कॉट ने बताया, " विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय का एक कार्यक्रम था 'इयर एब्रॉड ' जिसमें एक साल के लिए बाहर जाकर सीख सकते थे. मैं तिहत्तर में हिन्दुस्तान गया. वहाँ बनारस में रामदास चक्रवर्ती के गुरु अमिय गोपाल भट्टाचार्य से सितार सीखने लगा. अमिय बाबू प्राइवेट टीचर थे. वीज़ा के लिए ज़रूरी था कि मैं बी. एच. यू. में एनरोल करूँ. दोपहर में अमिय बाबू से सीखते थे. शाम को बी. एच. यू. जाते थे. अमिय बाबू से हमने बहुत सीखा. इयर एब्रॉड कार्यक्रम में सिर्फ़ एक साल हिंदुस्तान रहना था पर जब एक साल पूरा होने को आया तो मैं वहाँ और रहना चाहता था. मेरी एक साइकिल थी, एक नौकर था, किराये का मकान था, मैं हिंदी भी सीख रहा था. अंततः मैं वहीं रह गया. कुछ समय बाद राम चक्रवर्ती और उनकी शिष्या कृष्णा सान्याल भी वापस बी. एच. यू. आ गए. तो मैं एक ही समय अमिय बाबू, राम और कृष्णा --तीन जनरेशन्स --क्या कहते हैं हिंदी में?"

"पीढ़ियाँ. " मैंने बताया. 

"हाँ , तीन पीढ़ियों से सितार सीखने लगा. सितार ही सितार चल रहा था मेरी दुनिया में उस समय. रोज़ आठ घंटे रियाज़ करता था. कभी-कभी दस मिनट के लिए बाहर दुकान पर चाय पीने जाता था, तो चायवाले भी पूछते थे कि रियाज़ ठीक चल रहा है कि नहीं. १९७५ में अमिय बाबू गुज़र गए. बड़ी उम्र के थे. उसके बाद मैं सोचने लगा कि वापस लौटना है."

और फ़िर स्कॉट अमेरिका लौट आए. यू  सी. एल. ए. (लॉस एंजेलिस स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय) में पीएच. डी.  प्रोग्राम शुरू किया. वहाँ लेबनॉन के एक संगीतज्ञ के संपर्क में आए तो मध्य-पूर्वी (मिडिल ईस्टर्न) संगीत में भी रुचि हुई. कुछ सालों बाद स्कॉट काहिरा गए, मध्य-पूर्व का वाद्य 'ऊद ' बजाना सीखा और बाँसुरी भी. दरअसल उनकी पीएच. डी. की थीसिस का विषय भी मध्य-पूर्व के संगीत से ही संबंधित है. 

संगीत के दो एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न प्रकारों को एक ऐसे व्यक्ति द्वारा सीखना जिसकी अपनी संस्कृति उन दोनों से ही अलग हो, और उसे ही अपना 'करियर ' बनाना अपने आप में  बहुत बड़ी बात है. 

स्कॉट बाद में दो बार फ़िर भारत गए. उन्होंने भोजपुरी लोकगीतों में 'बिरहा' और 'कजली' पर काफ़ी काम किया. स्कॉट जब पहली बार भारत गए और तीन साल वहाँ रहे थे तभी भोजपुरी लोकगीतों में उनकी रुचि हुई थी. उनके नौकर का गाँव बनारस से सिर्फ़ १८ मील दूर था और स्कॉट अक्सर अपनी साइकिल से वहाँ जाकर लोकगीत सुना करते थे. बाद में जब वे इन लोकगीतों पर काम कर रहे थे तब उन्हें सुनने के लिए वे गाँव की कई बारातों में गए और लोकगीत रिकॉर्ड करते रहे. 

"अमेरिका के मुक़ाबले एक तो भारत वैसे ही कम विकसित देश है. फ़िर आप जिस तरह की जिंदगी वहाँ जीये, आपको कोई तकलीफ़, कोई असुविधा नहीं हुई?"

"नहीं, वह तो मेरे लिए एक रोमांच था. सिर्फ़ आख़िर के कुछ दिनों में पेट की गड़बड़ी हुई थी." स्कॉट ने मुस्कुरा कर बताया. 

"भारतीय शास्त्रीय संगीत दैवीय माना जाता है. वह आपको ईश्वर के क़रीब ले जाता है. क्या आपने ऐसा महसूस किया?"

"हाँ , सुर के पास शक्ति है. बजानेवाले को महसूस होता है. नादब्रह्म अपने आप में एक बहुत पॉवरफुल कांसेप्ट है. ध्वनि में रचनात्मक शक्ति है. संगीत ध्यान है."

एक शाम मैं युनिवर्सिटी में स्कॉट की सितार की कक्षा में गई थी. देखा कि क़रीब १०-१२ छात्रों की कक्षा में तीन छात्र भारतीय थे. ये छात्र इंजीनियरिंग या गणित जैसे विषयों की पढ़ाई करने के लिए अमेरिका आए हैं और साथ ही सितार भी सीख रहे हैं. यह देख कर बहुत अच्छा लगा कि स्कॉट अपने अमेरिकी छात्रों को भी 'क्या बात है' कह कर ही दाद दे रहे थे. तब मुझे महसूस हुआ कि 'क्या बात है' की टक्कर का कोई शब्द अंग्रेज़ी में है ही नहीं. 

स्कॉट भारत जाकर हिंदी तो सीखे ही, वहाँ के कुछ संस्कार भी उन्होंने आत्मसात किए. उनकी कक्षा में जब एक छात्र का पैर उसकी नोटबुक से छू रहा था तो स्कॉट ने उसे टोका और उस छात्र ने तुरंत नोटबुक वहाँ से हटा ली. स्कॉट मानते हैं कि यहाँ के लोगों के लिए यह समझ पाना मुश्किल है कि अगर सितार फ़र्श पर रखी हो तो उसे लांघ कर नहीं, उसकी बगल से निकल जाना चाहिए या यह कि कागज़ विद्या का रूप होता है, उसे पैर से नहीं छूना चाहिए, लेकिन इन बातों को बताए बिना स्कॉट से नहीं रहा जाता. 

इन छोटी-छोटी बातों को देखकर मानना पड़ता है कि स्कॉट ने भारत जाकर सिर्फ़ सितार बजाना ही नहीं सीखा, बल्कि भारत को पूरे मन से जिया भी है और हज़ारों मील दूर कैलिफोर्निया में भी भारत उनके आसपास है, उनके साथ है. 

Wednesday, October 8, 2025

यादों के पिटारे से: पैठणी.... रेशम और सोने से बुनी गई कविता!

मेरा यह लेख पत्रिका वामा के अप्रैल १९८५ के अंक में प्रकाशित हुआ था.  

महाराष्ट्र की पैठणी साड़ी, साड़ी नहीं, अपने आप में एक आभूषण होती है. रेशम और सोने के पानी चढ़े धागों से बनी यह साड़ी शाही परिवारों की महिलाएँ पहनती थीं. महाराष्ट्र के धनी परिवारों की दुल्हनें पैठणी पहनने वाली गिनी-चुनी महिलाओं में होती थीं. पर्शिया के राजा भी अपनी शाही पोशाक पैठण के बुनकरों से बनवाते थे. 

लेकिन समय के साथ पैठणी साड़ी के रंग फ़ीके पड़ते गए. ज़री की चमक कम होने लगी. न तो शाही परिवार रह गए और न ही दुल्हनों को पैठणी साड़ियों में सजाने की परंपरा. अब कुछ ही परिवार रह गए हैं, जो पारम्परिक पैठणी साड़ियाँ बुनते हैं. 

पैठण, महाराष्ट्र के औरंगाबाद के निकट एक छोटा-सा क़स्बा है. यहीं पर ये साड़ियाँ बनती रही हैं और इसीलिए 'पैठणी ' कहलाती हैं. क़रीब दो हज़ार वर्ष पूर्व पैठण में पाँच सौ परिवार थे जो पैठणी बनाने की कला सिर्फ़ जानते ही नहीं थे, वही उनकी जीविका थी. पैठणी हथकरघे पर ही बनती है. किसी प्रकार की मशीन का इस्तेमाल इसमें नहीं होता. ज़री के धागों और रेशम को तिल्लियों पर लपेटकर रखा जाता है. और बुनकर धागे गिन-गिन कर उन्हें एक-दूसरे के साथ बुनते जाते हैं और बेहतरीन डिज़ाइन बनाते हैं. ज़ाहिर है, इसमें बहुत समय लगता है. 


इसीलिए पैठणी साड़ी बहुत महँगी होती है. शाही परिवारों के लुप्त हो जाने से और आम जनता में पैठणी (महाराष्ट्र में इसे सिर्फ़ पैठणी ही कहा जाता है, इसके साथ साड़ी नहीं जोड़ा जाता) की कोई माँग न होने से पैठणी उद्योग मंदा हो गया. बुनकरों ने अपना परिवार चलाने के लिए जीविका के दूसरे साधन अपना लिए. जो बुनकर बच गए थे, वे भी किस उम्मीद से पैठणी बनाते?

लेकिन शुक्र है, पैठणी उद्योग पूरी तरह से नष्ट नहीं हुआ. महाराष्ट्र लघु उद्योग विकास निगम ने अब यह उद्योग अपने हाथ में ले लिया है और क़रीब नौ-दस परिवारों के १६-१७ लोग (जिसमें दो-तीन महिलाएँ भी हैं) अब इस निगम के कर्मचारियों के रूप में पैठणी बनाते हैं. 

पिछले दिनों नई दिल्ली में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले के महाराष्ट्र पैवेलियन में पैठणी साड़ियाँ प्रदर्शित की गई थीं. साथ ही पैठण से विशेष रूप से श्री प्रभाकर अम्बादास दालकरी को लाया गया था जो ज़री और रेशम का एक शॉल दर्शकों के सामने बना रहे थे. उन्होंने यह कला अपने पिता से सीखी, जो आज ८० वर्ष की उम्र में भी साड़ियाँ बनाते हैं. 

श्री दालकरी ने बताया कि सादी से सादी पैठणी बनाने में एक व्यक्ति को क़रीब दो महीने लग जाते हैं. वह भी तब जब वह दिन में १२ घंटे काम करे. अधिक अच्छी यानी चौड़े बॉर्डर वाली और ज़री के ज़्यादा काम वाली साड़ी बनाने में आठ महीने भी लग सकते हैं. इन दिनों तो धागों पर चाँदी का पानी चढ़ा कर ही ज़री बनाई जाती है और उसे सोने का रंग दिया जाता है. श्री दालकरी ने बताया कि असली सोने की ज़री अब नहीं बनती. ज़री सूरत में बनती है और उसकी क़ीमत तीन हज़ार से साढ़े पाँच हज़ार रुपए प्रति किलो होती है. सादी पैठणी में भी क़रीब दो सौ ग्राम ज़री होती है और पाँच सौ ग्राम रेशम. रेशम बंगलूर से आता है. सादी पैठणी की क़ीमत कम से कम तीन हज़ार रुपए होती है. २० हज़ार की भी पैठणी बनती है. तीन हज़ार रुपए की साड़ी बनाने वाले कलाकार को क़रीब आठ सौ रुपए मिलते हैं. पैठणी की उम्र बहुत लम्बी होती है. सौ साल पुरानी साड़ियाँ अब भी कुछ महाराष्ट्रीय परिवारों के पास हैं. 

पैठणी के बारे में एक और बात ग़ौर करने लायक है. इसका पल्ला पारम्परिक ढंग से लाल ही रंग का हो. लाल रंग के साथ ही ज़री सबसे ज़्यादा फबती है. और इसीलिए साड़ी और बॉर्डर के साथ मैचिंग का ख़्याल न रखकर पल्ला हमेशा लाल रंग का ही बनाया जाता है. 

अब ये साड़ियाँ केवल ऑर्डर पर बनती हैं. महाराष्ट्र लघु उद्योग विकास निगम ऑर्डर स्वीकार करता है. निगम दिसंबर में पैठण में ही एक प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना कर रहा है, जिसमें श्री दालकरी नए लोगों को पैठणी बुनने का प्रशिक्षण देंगे. 

निगम के पास फ़िलहाल जितने ऑर्डर हैं, वे अगले तीन वर्षों तक कर्मचारियों को व्यस्त रखेंगे. गुजरात से भी पैठणी के काफ़ी ऑर्डर आते हैं. १९८१ में पूरे वर्ष में ५३ साड़ियाँ बन पाई थीं. अब इससे अधिक साड़ियाँ बनाने की निगम की योजना है. पैठणी बनाना अपने आप में एक अनोखी कला है. इसे नष्ट होने से बचाना एक अच्छी बात है. 

Saturday, October 4, 2025

यादों के पिटारे से: गाँव-गाँव बिखरी सांस्कृतिक विरासत

 मेरी यह पुस्तक समीक्षा १० फरवरी १९९० के नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुई थी. 

चौपाल यदि हमारे गाँवों के सामाजिक केंद्र थे तो मंदिर धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र. मंदिर सिर्फ़ वह इमारत नहीं होती जिसमें भगवान की मूर्ति प्रतिष्ठित होती है, इस इमारत का एक-एक पत्थर उस बीते युग की कहानी सुनाता है जिसके ये पत्थर गवाह रहे हैं.

महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत बहुत समृद्ध है जो आज भी इस प्रदेश में गाँव-गाँव बिखरे मंदिरों के रूप में अपनी सम्पन्नता का अहसास कराती है. बीते दिनों की शिल्पकला, वास्तुकला आदि का अध्ययन करने के लिए मंदिर बहुत अच्छा माध्यम साबित हो सकते हैं. महाराष्ट्र सूचना केंद्र ने हाल ही में ' द टेम्पल्स ऑफ़ महाराष्ट्र' (महाराष्ट्र के मंदिर) नामक एक सचित्र पुस्तक प्रकाशित की है जो महाराष्ट्र के प्रमुख मंदिरों की एक परिचयात्मक झलक पेश करती है. 


इसमें ३१ मंदिरों के बारे में जानकारी है जो बहुत विस्तृत तो नहीं, लेकिन इतनी संक्षिप्त भी नहीं है कि महज एक नोटनुमा लगे. इसमें मंदिर की बनावट का ज़िक्र है तो उसकी भौगोलिक स्थिति का भी. साथ ही मंदिर का इतिहास, उससे जुड़े किस्से-कहानियाँ, उसमें प्रतिष्ठित देवी-देवताओं के बारे में जनमानस में प्रचलित विश्वास आदि हैं. 

लेखक गोपाल कृष्ण कान्हेरे ने १७ वीं और १९ वीं शताब्दी के दौरान मराठा काल में बने मंदिरों पर ज़्यादा ज़ोर दिया है. इन मंदिरों में विभिन्न शैलियों का मिश्रण देखा जा सकता है जो स्थानीय शैली के साथ मिलकर मराठा वास्तुकला के रूप में सामने आई. पुणे के पेशवाओं ने तो कुछ मंदिरों में मीनारें तक बनवाईं. ज़ाहिर है यह इस्लामी वास्तुकला का प्रभाव था. रायगढ़ के एक मंदिर परिसर में शिवाजी महाराज ने भी छोटी-छोटी मीनारें बनवाई थीं. 

ये मंदिर सिर्फ़ स्मारक ही नहीं, इनमें से ज़्यादातर ऐसे जीवंत भवन हैं जहाँ आज भी पारम्परिक उल्लास के साथ त्योहार मनाए जाते हैं. मंदिरों में बजनेवाले ढोल, नगाड़ों और शहनाई के सुरों में, वहाँ से उठनेवाली फूल और अगरबत्तियों की ख़ुशबू में और वहाँ बँटनेवाले प्रसाद की मिठास में आज भी ऐसी ज़बरदस्त कशिश है कि साल-दर-साल तीर्थयात्री और पर्यटक इन मंदिरों की ओर खींचे चले आते हैं. 

हर मंदिर मुख्यतः तीन हिस्सों में बँटा होता है__एक बड़ा हॉलनुमा कमरा जो सभामंडप कहलाता है, दूसरा अंतराल जो छोटा होता है और सबसे अंदर होता है गाभारा जहाँ देवी या देवता की मूर्ति प्रतिष्ठित होती है. इसी हिस्से के ऊपर शंकु के आकार का ऊँचा शिखर होता है जिस पर अंदर-बाहर से पच्चीकारी, चित्रकारी के सुन्दर नमूने देखे जा सकते हैं. ज़्यादातर मंदिर राजे-रजवाड़ों ने बनवाए और मंदिरों को सुन्दर बनाने के लिए अच्छे से अच्छे कलाकारों की मदद ली. इन कलाकारों की मेहनत से सजे मंदिरों को कई बार मुस्लिमों के हमलों का शिकार होना पड़ा. कुछ मंदिर तो कई बार टूटे और कई बार बने. शायद हमलों से बचाव के लिए ही पुणे के पर्वती और जेजुरी तथा शिखर शिंगणापुर के मंदिरों के इर्दगिर्द किले की तरह दीवार बनी है. 

ज़्यादातर मंदिर किसी ख़ूबसूरत स्थान --जैसे किसी पहाड़ी पर या किसी झील के किनारे बने हुए हैं. गणपतिपुले का गणपति मंदिर या महाबलेश्वर का महाबलेश्वर मंदिर ऐसे ही मंदिरों में हैं. कुछ मंदिर महान संतों की जन्मस्थली या कर्मस्थली पर भी बने हैं जैसे आलंदी का ज्ञानेश्वर मंदिर. मंदिर भक्तों की सिर्फ़ आध्यात्मिक प्यास ही नहीं बुझाते, उनकी भौतिक ज़रूरतों का भी ख़याल रखते थे. पुराने समय में जब महिलाओं का घर से बाहर निकलना अच्छा नहीं समझा जाता था, तब उत्सवों के दौरान या विशेष त्योहारों के अवसर पर मंदिरों के पास लगनेवाले मेलों में महिलाएँ अपनी ज़रूरत की चीज़ों की ख़रीदारी कर लेती थीं. भगवान के दर्शनों के साथ-साथ किसी रमणीक स्थल की सैर का आनंद तो मिलता ही था. मंदिरों में अक्सर संगीत और कीर्तन के कार्यक्रम होते जिन्हें सुनने सारा परिवार एक साथ आता. 

यह सही है कि आज मनोरंजन, सैर-सपाटे और ख़रीदारी के लिए तमाम दूसरी जगहें हैं इसलिए मंदिरों का इन कामों के लिए होनेवाला उपयोग अब कम हो गया है. लेकिन आज भी श्रद्धालुओं के मन में मंदिरों की एक ख़ास जगह है. 

Monday, September 15, 2025

"Ullozhukku": An Emotional Undercurrent!

The torrential rains play as important a role in "Ullozhukku" (The Undercurrent) as do the two female leads. The 2024 Malayalam film shot on location in the backwaters of Kerala soaks the viewers not only in floods of water, but also in an outpouring of emotions as they witness the journey of Anju and Leelamma, the daughter-in-law and mother-in-law portrayed wonderfully by the very talented team of Parvathy Thiruvothu and Urvashi respectively. The story of the duo's intertwined relationship is at the centre of this brilliantly crafted film.

The pounding rain has been used very effectively by writer and director Christo Tomy. The continuous onslaught of sheets of water drenching Leelamma's house and its surroundings makes the viewers uneasy. The rain also serves as an apt metaphor for the emotional turmoil of the two lead players. It starts moderately, turns into a huge downpour and then starts clearing towards the end. 

What makes the film stand out is the fact that this is Tomy's debut feature filmIt has received critical acclaim and awards. It won the National Film Award for Best Malayalam Feature Film. Urvashi bagged the same for Best Actress in a Supporting Role. The film also won Kerala State Film Awards in several categories.

Anju works as a saleswoman in a saree shop. She is in love with Rajeev who does not have a secure job. Anju is married off to a well-to-do Thomaskutty by her parents. As she is trying to come to terms with her new life in this loveless marriage, Thomaskutty's failing health makes her take on the role of a caretaker for her new husband. The couple lives with Thomaskutty's mother Leelamma in a comfortable house in a flood-prone area. The two women linked by the ailing Thomaskutty get entangled in a stormy relationship where secrets tumble out changing the dynamics of the equation between them multiple times. 

Tomy has handled this part with a lot of care, giving each character enough time to project themselves. Also, he has written his characters very well. At times, the narration may seem to be slow, but then the characters are so well fleshed out that it is a pleasure watching them on the screen. No scheming, no plotting, no exaggerated expressions, no melodrama...pure storytelling at its best. The narration is layered, the characters are neither black, nor white, but a graceful grey and hence very believable. The verdant landscape of Kerala is a treat to the eyes, although at times the water in and around the house is unsettling. The boat trips the characters make to get to the mainland are a visual delight. 

The two male actors playing Rajeev and Thomaskutty have smaller roles and they are good at it. The cinematography is superb and the music is appropriately understated. 

I recommend this film to those who enjoy meaningful cinema. It is streaming on Prime Video. I watched it in original Malayalam with subtitles in English. If I could follow the dialogues in Malayalam, it would have added another dimension to my appreciation of the film. 

And finally, some trivia. Parvathy Thiruvothu was seen with Irrfan Khan in the 2017 romantic comedy "Qarib Qarib Singlle" and with Pankaj Tripathi in the 2023 psychological thriller "Kadak Singh". Urvashi acted in 1988 political thriller "New Delhi". Both of them have worked largely in Malayalam, Tamil, Kannada and Telugu cinema.

Wednesday, September 10, 2025

On The Trail With Inspector Zende!

"Inspector Zende" streaming on Netflix has been generally labelled as a comedy/thriller. The 112-minute long film features Manoj Bajpayee--a very intense actor who has played a cop many times during his remarkable career--in the titular role of inspector Madhukar Bapurao Zende of the Mumbai Police who had the rare distinction of catching the infamous serial killer, fraudster and thief Charles Sobhraj not once, but twice. Here Bajpayee appears in a lighthearted comic avatar. Jim Sarbh essays the role of Charles Sobhraj, who for some reason has been named Carl Bhojraj in the film.


The film opens with the news of Bhojraj's escape from Tihar Jail in 1986 after he treated the jail staff to kheer laced with sedative as a part of his birthday celebration. Zende had arrested him once earlier in 1971, so he gets assigned with the job of tracking Bhojraj.

As the hunt starts, visuals from Mumbai and Goa of the eighties do look delightful and refreshing. Zende, his teammates and their boss DGP Purandare (Sachin Khedekar), Zende's wife (Girija Oak), children and his mother, all of them look innocent straightforward people. It is endearing to see the policemen working without any modern security or surveillance equipment, and on a meagre budget. But the same cannot be said about Jim Sarbh's Bhojraj. He does not appear menacing enough to be an international serial killer. His long hair, moustache, and laboured accent reduce him to being a caricature, far from being the charmer that he was in real life. 

Chinmay Mandlekar, a well-known writer, director and actor mostly active in the Marathi entertainment industry has written and directed "Inspector Zende". Why he chose to make a film that focuses on the chase of a serial killer as a comedy is something beyond comprehension. The subject and its treatment do not match each other. 

While the film is mostly clean and suitable for family audiences, it is a pity to see an actor of Bajpayee's calibre being wasted in an average story and script. The jokes are weak, the direction is simplistic and the pace of the film is slow. This does not mean that Bajpayee is not suitable for comedy. It is just that a tame comedy is not enough to tap into his potential. 

To name a few instances from the film, police teams from Delhi, Goa and Mumbai clashing over claiming the capture of Bhojraj is mindless and childish. The fight sequence between Zende and Bhojraj in the middle of couples dancing in a hotel is funny, but it dilutes the importance of the moment and reduces it to a farce. Bhalchandra Kadam, a prominent comedian from Marathi industry playing one of Zende's teammates fails to make an impact. After watching the film, one is left with the impression that sometimes even when you have all the right ingredients, a tasty dish eludes you.

Wednesday, April 9, 2025

यादों के पिटारे से: बहू -बेटी की मौत से पुण्य कमाने वाले समाज से कुछ सवाल

 मेरा यह लेख २७ सितम्बर, १९८७ के नवभारत टाइम्स में रविवार्ता के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था. 

अठारह वर्षीया रूपकँवर दुल्हन के वेश में कितनी सुंदर लग रही थी! सिर से पैर तक गहनों से लदी, नखशिखांत श्रृंगार के साथ. लेकिन वह विवाह की वेदी पर नहीं, अपने पति की चिता पर चढ़ने जा रही थी--उसके साथ जलकर भस्म होने के लिए. 

राजस्थान के सीकर जिले के दिवराला गाँव में अभी आठ महीने पहले ही तो रूपकँवर दुल्हन बनकर आई थी. अपने पिता के घर से भरपूर दहेज के साथ. २५ तोला सोना, टेलीविजन, रेडियो, पंखे, फ्रिज... क्या नहीं लाई थी वह अपने साथ! एक सुखी गृहस्थी का सपना आँखों में लिए रूपकँवर ने अपने पति मानसिंह के घर में कदम रखा था. ज़िंदगी अपनी तरह चल रही थी कि अचानक सितम्बर की पहली तारीख़ को मानसिंह को उल्टी -दस्त होने लगे. उसे सीकर के सरकारी अस्पताल में दाखिल कराया गया. लेकिन चार सितम्बर का दिन उसकी ज़िंदगी का आख़री दिन रहा. मानसिंह की मृत्यु के साथ ही रूपकँवर ने सती होने की इच्छा व्यक्त की. उसके परिवारवालों ने न तो इसका विरोध किया और न ही इसकी ख़बर किसीको होने दी. 

आज... यदि प्रधानमंत्री के घिसे-पिटे मुहावरे का उपयोग किया जाए तो... जब देश २१वीं सदी में प्रवेश करने को तैयार है तब रूपकँवर द्वारा सदियों पुरानी इस प्रथा का पालन करना कई सवाल खड़े करता है. एक तो यह कि दसवें दर्जे तक पढ़ी रूपकँवर को पति की मृत्यु के बाद सती होने के अलावा और कोई रास्ता क्यों नज़र नहीं आया? दूसरे यह कि उसकी ससुरालवालों ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? --इस संदर्भ में कहीं यह दहेज हत्या का दूसरा रूप तो नहीं, या क्या उसकी ससुरालवाले इतने अंधविश्वासी हैं कि बहू की मौत में ही उन्हें अपना पुण्य नज़र आया; या बहू के सती होने में उन्हें अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने का आसान रास्ता दिख गया? तीसरे यह कि क्या प्रशासन और क़ानून पूरी तरह से अंधे-बहरे हो गए हैं जो रूपकँवर को सती होने से रोक नहीं सके? (पुलिस द्वारा कुछ महिलाओं को सती होने से रोकने की ख़बरें पहले मिली हैं लेकिन यहाँ पुलिस का कहना है कि उन्हें कोई सूचना ही नहीं मिली) और चौथा सवाल उन हज़ारों -हज़ार लोगों को लेकर है जो रूपकँवर का सती होना एक तमाशे की तरह देखते रहे, लेकिन उसे रोकने के लिए कुछ नहीं कर सके. 

इन सवालों के स्पष्ट जवाब शायद कभी न मिल पाएँ लेकिन इनका उठना निरर्थक नहीं है. इनके जवाब ढूँढ़ने की कोशिश की जाए तो आधुनिकता का दंभ भरनेवाले समाज का वह बदबूदार पिछवाड़ा दिखता है जो हर तरह की गंदगी से पटा पड़ा है और जिसे साफ़ करना कोई नहीं चाहता. 

हो सकता है, विधवा की कलंकित ज़िंदगी जीना रूपकँवर को रास न आता नज़र आया हो और उसने अपने ज़िंदगी का अंत कर लेने में ही अपनी भलाई समझी हो. रूपकँवर के मामले में बात करते हुए सीकर जिले के ही एक ग्रामीण ने कहा, 'हमारे समाज में विधवा को कुलच्छनी माना जाता है. उसे नंगे पैर चलना पड़ता है, ज़मीन पर सोना पड़ता है. वह घर से बाहर नहीं निकल सकती और किसी पुरुष से बात भी नहीं कर सकती. ऐसी ज़िंदगी जीने से तो अच्छा हुआ वह मर ही गई.'

रूपकँवर के पिता भी कोई अनपढ़, गँवार ग्रामीण नहीं हैं. जयपुर में उनकी एक ट्रांसपोर्ट एजेंसी है. लेकिन अपनी बेटी के सती होने पर वह कहते हैं, 'रूपकँवर के त्याग ने हमारे दोनों ख़ानदानों को अमर बना दिया है. मेरी बेटी तो अब 'देवी' बन गई है जिसकी हज़ारों श्रद्धालु पूजा करेंगे.' वह प्रसन्न हैं कि उनकी बेटी ने उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाई है. 

जब सती हो गई महिला के परिवारवाले, उसकी ससुरालवालों के साथ उसके पिता भी अपनी बेटी के बलिदान को लेकर इतने प्रसन्न हैं, तो इस घटना के लिए क़ानून और प्रशासन को दोष देने से पहले एक बार सोचना पड़ता है. अदालत का क़ानून और सरकार का निर्देश जनता के लिए क्या मायने रखता है, यह तो उसी समय पता चल गया कि जब सती के १३ दिनों बाद होने वाले चूंदड़ी महोत्सव को सरकारी आदेश की धज्जियाँ उड़ाते हुए किसी त्योहार की-सी धूमधाम से मनाया गया. राजस्थान के कुछ महिला संगठनों की अपील पर राजस्थान उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि रूपकँवर की चूंदड़ी चढ़ाने की रस्म पर समारोह न होने दिया जाए. इसके बावजूद लाखों लोगों की मौजूदगी में रूपकँवर की चिता पर सुहाग की प्रतीक चूंदड़ी चढ़ाई गई. यह चूंदड़ी चार हज़ार एक सौ रूपए की बताई जाती है और इसे रूपकँवर के मायकेवाले लाए थे. इस समारोह का तय समय से दो घंटे पहले ही हो जाना, समारोह के दौरान सती-स्थल पर पुलिस की गैर-मौजूदगी, समारोह स्थल पर गाँव के स्वयंसेवकों का हुक्म और राजपूत नौजवानों का चिता के आसपास नंगी तलवारें लिए लगातार परिक्रमा करना यह बताता है कि जिस बात को आम आदमी का जबरदस्त समर्थन हो, उसे रोकना क़ानून और सरकार के बस की बात नहीं।

लेकिन इस बात को आम आदमी का इतना जबरदस्त समर्थन मिलने के क्या कारण हो सकते हैं? इसका जवाब ढूँढ़ने के लिए हमें उन मान्यताओं, विश्वासों, अंधविश्वासों की पड़ताल करनी होगी जो सदियों से हमारे यहाँ बच्चों को घुट्टी में पिलाए जाते हैं. हमारे यहाँ मृत्यु को जीवन का अंत न मानकर मोक्ष प्राप्त करने की ओर बढ़ाया गया एक कदम माना जाता है. यहाँ महिलाएँ साल-दर-साल एक विशेष दिन व्रत रखती हैं कि अगले जन्म में भी उन्हें यही पति मिले. यहाँ यह माना गया है कि मृत्यु के बाद की दुनिया में भी व्यक्ति को वही सब मिले जो इस जन्म में उसे सुख-शांति देता रहा है. पति के साथ जल मरने को पतिव्रत्य का महानतम उदाहरण माना गया. इन 'अलौकिक' कारणों के साथ कुछ लौकिक कारण भी समय-समय पर इससे जुड़ते गए जैसे कि घर-परिवार में विधवा के साथ होनेवाले व्यवहार को देखकर कुछ महिलाओं ने सती होने का निर्णय किया हो या जैसे मुग़लों के भय से, आत्मसम्मान की रक्षा की ख़ातिर राजपूत महिलाओं ने जौहर (सामूहिक सती) किया. 

इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि सती एक सामाजिक मान्यता है. हमारे यहाँ के किसी शास्त्र में इस प्रथा का उल्लेख नहीं है. ऋग्वेद और अथर्ववेद में ज़रूर ऐसी प्रथा के संकेत मिलते हैं. गरुड़पुराण और भागवतपुराण में भी सती का उल्लेख है. लेकिन हर घर में सती प्रथा का पालन होता था, ऐसा नहीं है. बल्कि समय-समय पर इसे रोकने की कोशिश भी होती रही. अकबर और जहांगीर ने सती प्रथा को दबाया. फिर आगे चलकर अंतिम पेशवा बाजीराव और मराठा महारानी अहिल्याबाई ने भी लोगों में सती प्रथा के खिलाफ जागरूकता फैलाई. अंत में राजा राममोहन राय के प्रयासों के फलस्वरूप लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने सन १८२९ में सती प्रथा पर निषेध लगा दिया. 

लेकिन एक बात ग़ौर करने लायक है --सती प्रथा को सिर्फ़ हिन्दू मान्यताओं ने ही जन्म दिया हो--ऐसा नहीं है. एशिया के अलावा अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में भी मृत व्यक्ति के साथ उसकी पत्नी/पत्नियाँ, ग़ुलाम, क़ैदी और घोड़े जलाए या दफ़नाए जाते थे. लेकिन भारत में इसे जैसा सामाजिक समर्थन मिला, उसके चलते निषेध लगने के १५८ साल बाद आज भी सती हो जाने के इक्का-दुक्का उदाहरण मिल ही जाते हैं. 

इसी सिलसिले में रूपकँवर का सती होना हमें फिर एक बार अपनी सामाजिक व्यवस्था को जाँचने के लिए कहता है--ऐसी व्यवस्था जहाँ अभी यह माना जाता है कि पति के बाद पत्नी का कोई स्थान नहीं है--न परिवार में, न समाज में. जब तक यह मान्यता नहीं बदलती, तब तक कोई विधवा चाहे घुट-घुटकर जीने को मजबूर की जाए, चाहे पति के साथ जलकर मर जाए--शायद कोई फ़र्क नहीं पड़ता. 

Monday, April 7, 2025

"यादों के पिटारे से: 'मेरा चुनाव लोगों ने ही लड़ा'---सुमित्राजी

भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता सुमित्रा महाजन २०१४ से २०१९ तक लोकसभा की स्पीकर रहीं. वह  १९८९ से २०१९ तक लगातार इंदौर लोकसभा क्षेत्र से भाजपा की प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीतीं. उनकी छवि एक कुशल और साफ़-सुथरी नेता की रही है. मुझे १९८९ में दिल्ली में उनसे मिलने का और बातचीत करने का मौक़ा मिला. उस समय उन्हें पहली बार सांसद बनकर कुछ महीने ही हुए थे. वह एक आम मध्यवर्गीय मराठीभाषी महिला की तरह बहुत सादगी से मुझसे मिलीं. उनकी सादगी वरिष्ठ नेता बनने के बाद भी क़ायम रही.सुमित्राजी इंदौर में 'ताई' के नाम से लोकप्रिय हैं. आज यदि मैं उनके बारे में लिखती तो उन्हें ताई ही कहती.  २४ दिसंबर १९८९ के नवभारत टाइम्स में स्तम्भ 'नए चेहरे' के अंतर्गत मेरी उनके साथ की गई बातचीत प्रकाशित हुई थी. आज उसीको अपने ब्लॉग पर संजो कर रख रही हूँ. 

इंदौर से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर लोकसभा के लिए चुनी गईं सुमित्रा महाजन के बारे में सबसे पहली बात तो यह कि उन्होंने करीब चार साल तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार में एक समय गृह, रेल और पेट्रोलियम एवं रसायन जैसे विभागों के मंत्री रह चुके कांग्रेसी दिग्गज प्रकाशचंद सेठी को हराया है. करीब तीन साल पहले दिल्ली से बम्बई बात कर रहे श्री सेठी का फोन अचानक कट जाने पर उनके आधी रात किदवई भवन ट्रंक एक्सचेंज पहुँचने, वहाँ गाली-गलौज करने, पिस्तौल निकाल लेने और ड्यूटी पर तैनात महिला कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार करने की ख़बरें उस वक़्त सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से छपी थीं. खबर यह भी थी कि श्री सेठी मानसिक असंतुलन के शिकार हैं. ट्रंक एक्सचेंज वाली घटना की तरह कुछ और घटनाएँ भी हुईं जिन्होंने मानो उनके मानसिक असंतुलन वाली बात की पुष्टि कर दी. 

पिछले कुछ दिनों में सेठीजी ख़बरों में नहीं के बराबर थे तो लगा कि वे राजनीति के वानप्रस्थ काल में पहुँच गए हैं. ऐसे व्यक्ति को इंदौर से टिकट देकर कहीं कांग्रेस ने स्वयं ही इंदौर में अपनी हार को न्यौता तो नहीं दिया था? इस सवाल के जवाब में सुमित्राजी कहती हैं: 'नहीं, नहीं. सेठीजी जीत भी सकते थे. हो सकता है मेरी बजाय कोई और उनका सामना करता तो जीत ही जाते. यूँ जीत के प्रति आश्वस्त तो कोई नहीं होता... मैं भी नहीं थी. आख़िर सेठीजी इससे पहले जीतते ही तो आए हैं.'

जीत के प्रति आश्वस्त होना तो दूर, सुमित्राजी बताती हैं कि लोकसभा चुनाव लड़ने का उनका कोई ख़ास इरादा भी नहीं था. लेकिन पार्टी की इच्छा थी इसलिए वह चुनावी मैदान में उतरीं. उनकी उम्मीदवारी की ख़बर सुनकर कई लोगों के मन में यह सवाल आया और कुछ ने तो उनसे पूछा भी कि सेठीजी चुनाव पर जितना खर्च कर सकते हैं उसका मुक़ाबला न तो आप कर सकती हैं, न ही आपकी पार्टी. फिर उनका सामना आप कैसे करेंगी? सुमित्राजी का जवाब होता था--आप देखिए, लोग मुझे वोट भी देंगे और नोट भी देंगे. और यही हुआ भी. लोग आते और सुमित्राजी से कहते: सुमित्रा ताई ( दीदी के लिए मराठी शब्द), हमारे घर में दस वोट हैं, ये लीजिए दस रूपए.' तो एक तरह से मेरा चुनाव लोगों ने ही लड़ा. युवाओं ने, महिलाओं ने मेरे लिए बहुत काम किया.' सुमित्राजी अपने कार्यकर्ताओं के प्रति अभिभूत होकर बताती हैं. 

वैसे अपनी पार्टी और उसके उम्मीदवारों के लिए सुमित्राजी भी काफ़ी काम करती रही हैं. इमर्जेंसी के बाद १९७७ में जब कुछ लोगों ने जेल के भीतर से ही चुनाव लड़ा तब सुमित्राजी उनके समर्थन में बहुत सक्रिय रहीं. १९८५ के विधानसभा चुनाव में सुमित्राजी ने पहली बार अपनी क़िस्मत आजमाई लेकिन उस समय उन्हें हराकर कांग्रेस के महेश जोशी विधायक बने. 

सुमित्राजी विधायक नहीं बन सकीं लेकिन वह एक अर्से से इंदौर में धार्मिक और सामाजिक प्रवचनकार के रूप में जानी जाती रही हैं. धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या करने की उनकी रोचक और रसपूर्ण शैली इंदौर के मध्यवर्गीय मराठीभाषी परिवारों में काफ़ी लोकप्रिय है. यही मध्यवर्गीय मराठीभाषी परिवार इंदौर के मतदाताओं का काफ़ी बड़ा हिस्सा बनाते हैं. इनके बीच सुमित्राजी की छवि एक ऐसी साफ़-सुथरी मध्यवर्गीय गृहिणी की है, जो राजनीति की कालिख और गंदगी से बहुत दूर है. ' लेकिन मैं राजनीति में हूँ और अपनी जीत के बाद अब दावे से कह सकती हूँ कि राजनीति में अभी भी साफ़-सुथरे लोगों के लिए जगह है, और यह भी कि सिर्फ़ पैसे के बल पर ही चुनाव नहीं जीते जाते. '

सुमित्राजी लोकसभा में इंदौर का प्रतिनिधित्व करेंगी, लेकिन वह मूलतः इंदौर की नहीं हैं. इंदौर इनकी ससुराल है और शादी के बाद पिछले २४ वर्षों से वे इंदौर में रह रही हैं. महाराष्ट्र के एक कस्बे चिपलूण में पली-बढ़ीं सुमित्राजी ने मैट्रिक तक की पढ़ाई चिपलूण में ही की. फ़िर बम्बई आ गईं. माता-पिता की मृत्यु बहुत जल्दी हो गई थी. शादी के बाद अपने पति और परिवार की मदद से सुमित्राजी ने बी. ए. की शिक्षा पूर्ण की. मनोविज्ञान में एम. ए. किया, एल. एल. बी. भी किया. इसी बीच वह दो बेटों की माँ बनीं. अपने बेटों की परवरिश और परिवार की जिम्मेदारी के साथ-साथ शहर के सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक परिवेश में सक्रिय रहीं और अब जब बेटे बड़े हो गए हैं( बड़ा बेटा इंजीनियर है और छोटा बी. एस-सी. के दूसरे साल में है) तब सुमित्राजी देश के सर्वोच्च सदन में इंदौर का प्रतिनिधित्व कर रही हैं. 

सुमित्राजी प्रदेश महिला मोर्चा की महामंत्री हैं. साथ ही बाल संरक्षण गृह, अनाथालय, महिला सुधार गृह जैसी संस्थाओं की समिति की सदस्या हैं. पिछले दिनों इन्होंने अहिल्या मातृशक्ति संवर्धन केंद्र का गठन किया है जहाँ पीड़ित महिलाओं को कानूनी सहायता दी जाएगी. तलाक़ के मामले, दहेज़ के मामले आदि भी सुलझाए जाएँगे। कामकाजी औरतों के बच्चों के लिए झूलाघर शुरू किया है. वैसे तलाक़ के मामलों में सुमित्राजी अपने पति (जो कि वकील हैं) की भी सहायता करती रही हैं. उनकी कोशिश रहती है कि कोर्ट में जाने से पहले ही किसी तरह मामला सुलझ जाए. 

इंदौर के करीब देवास और पीथमपुर में कई उद्योगों के खुलने से इंदौर प्रदेश का सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र हो गया है, लेकिन उस हिसाब से वहाँ विकास उतना नहीं हुआ है जितना होना चाहिए. पानी की समस्या यहाँ की एक बड़ी समस्या है. सुमित्राजी नर्मदा योजना का दूसरा चरण शीघ्र पूरा कराने का प्रयास करेंगी. शहर की आबादी और वाहनों की संख्या के अनुपात में वहाँ की सड़कें बहुत सँकरी हैं. इस समस्या का समाधान शहर के बाहरी किनारों पर रिंग रोड बनवा कर किया जा सकेगा.

एक समय अपने कपड़ा उद्योग के लिए प्रसिद्ध इंदौर की कई मिलें बीमार पड़ी हैं जिसके कारण बेरोज़गारी बढ़ी है. सुमित्राजी की कोशिश रहेगी कि इन बीमार मिलों को शुरू कराया जाए. आसपास के गाँवों तक पक्की सड़कें नहीं तो कम-से-कम पहुँच-मार्ग बनें. सुमित्राजी का मानना है कि जब सांसद और विधायक साथ मिलकर काम करेंगे, तब ही अपने क्षेत्र के लिए कुछ ठोस उपलब्धियाँ हासिल कर पाएँगे.

सुमित्राजी काफ़ी आशावान हैं. १९६७ और १९७७ को छोड़कर हमेशा कांग्रेसी उम्मीदवार को लोकसभा भेजनेवाले इंदौर ने पहली बार भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी को दिल्ली भेजा है. १९६७ में सिटीजन्स फोरम के होमी दाजी (अब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में) और १९७७ में जनता पार्टी के कल्याण जैन (अब जनता दल में) इंदौर से निर्वाचित हुए थे. अब यदि इंदौर की जनता ने इस ४६-वर्षीया 'गृहिणी' को करीब एक लाख १२ हजार मतों से जिताया है तो इसी उम्मीद के साथ कि वह उनकी घरों को, उनके नगर को अपने कुशल हाथों से सँवारेंगी. 

Friday, April 4, 2025

यादों के पिटारे से: आधुनिक बालाओं को पुरातनी सीख

मेरा यह लेख १२ नवम्बर, १९९२ के नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुआ था. इसमें लिखी कुछ बातें शायद आज के माहौल में विसंगत लगें, लेकिन यह तीन दशक अधिक से पहले लिखा गया था और इसलिए इसे उसी परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जाना चाहिए. अपने पुराने लेखों को अपने ब्लॉग पर संजो कर रखने की मेरी कोशिश की अगली कड़ी है यह पोस्ट: 

महिलाओं की एक अंग्रेज़ी पत्रिका के सितम्बर अंक में टीनएज (१३ से १९ वर्ष की उम्रवाली) लड़कियों को एक अनमोल सलाह दी गई है. एक पन्ने के इस लेख में बताया गया है कि किस तरह लड़कियाँ अपने बॉयफ्रेंड को किसी दूसरी लड़की की ओर आकर्षित होने से रोक सकती हैं. इससे पहले कि इस लेख पर कोई टिप्पणी की जाए, ज़रा पढ़ लीजिए कि यह लेख आख़िर कहता क्या है--

"लड़कियों, लड़के आख़िर लड़के ही हैं. आपका बॉयफ्रेंड भी अपने यार-दोस्तों के साथ कुछ समय बिताना चाहेगा. उसे इतनी आज़ादी दीजिए कि वह रात में अपने दोस्तों के साथ घूमने जा सके, वीडियो गेम खेल सके या चाहे तो 'ब्लू फिल्म' भी देख सके. उसे कुछ समय अपनी तरह से बिताने दीजिए. आख़िर आप भी तो चाहेंगी कि आप कुछ समय अपनी सखियों के साथ गुज़ारें और ऐसे काम करें जो लड़कियाँ आम तौर पर करती हैं, जैसे अपने लिए कपड़े या जूते खरीदना. लड़के तो शॉपिंग से नफ़रत करते हैं, इसलिए आप यह काम अपनी सखियों के साथ कर लें. 

"जब आप अपने बॉयफ्रेंड के साथ बाहर जाती हैं तो ग़ौर कीजिए कि आपकी कौनसी बात उसे अच्छी लगती है, आपके कौनसे कपडे, आपकी लिपस्टिक का कौनसा शेड उसे पसंद है. उसके साथ बाहर जाते वक़्त उसीकी पसंद के अनुरूप श्रृंगार कीजिए. कुछ लड़के तो आपके लिपग्लॉस का स्वाद या गंध भी पसंद करेंगे. यदि आपके बॉयफ्रेंड को जींस पसंद हैं और वह चाहता है कि आप जींस पहनें, वह आपको तुरंत बता देगा. यदि आपकी स्कर्ट का लंबापन या छोटापन उसे अखरता है तो वह ज़रूर आपसे कहेगा. 

"अपने बॉयफ्रेंड के साथ जब आप किसी पार्टी में जाएँ तो जोंक की तरह उससे चिपटी न रहें. इससे आप 'पज़ेसिव' कहलाई जाएँगी. उसे अपनी पसंद की अन्य लड़कियों के साथ 'डांस' करने दें और आप भी अन्य लड़कों के साथ नाचें. बस, पार्टी का आख़िरी डांस यदि वह आपके साथ करे तो वही काफ़ी है. 

"आपका बॉयफ्रेंड तयशुदा वक़्त पर न आए या आने में उसे कुछ देर हो जाए तो तनिक भी नाराज़ न होइए. आख़िर वह भी एक इंसान है और इंसान गलतियाँ करता है. हो सकता है कि वह आपके पास आने के लिए तैयार हो रहा था कि उसी वक़्त उसकी जींस या पैंट का ज़िपर टूट गया और उसे दूसरे कपड़ों को इस्त्री करनी पड़ गई, जिसकी वजह से उसे आने में देरी हो गई. वह यह सब आपसे नहीं कहेगा, क्योंकि इसे वह अपनी मर्दाना शान के ख़िलाफ़ मानता है. 

"अपने बॉयफ्रेंड को उसकी सिगरेट पीने की आदत को लेकर परेशान न करें. यदि ऐसा करेंगी तो वह आपको छोड़कर किसी और से दोस्ती कर लेगा. जब आपका जन्मदिन आनेवाला हो तो धीरे से उससे कहिए, 'मेरे जन्मदिन का सबसे बढ़िया तोहफ़ा यही होगा कि मैं जिसे चाहती हूँ, वह सिगरेट पीना छोड़ दे.' अपने बॉयफ्रेंड की दाढ़ी या लम्बे बालों के बारे में भी यही नुस्ख़ा आज़मा सकती हैं. "

ऊपर-ऊपर से आधुनिक लगनेवाला यह लेख क्या लड़कियों को दक़ियानूसी बातें सिखाता-सा नहीं लगता?आख़िर वह यही तो कह रहा है कि अपने बॉयफ्रेंड के हर तरह के व्यवहार को सहें, संयम रखें. उससे कुछ कहना भी हो तो इस तरह से कहें कि वह नाराज़ न हो जाए. हाँ, उसकी पसंद का ख़्याल ज़रूर रखें और उसीकी पसंद के अनुरूप कपडे पहनें. यदि ऐसा न करेंगी तो वह आपको छोड़कर किसी और से दोस्ती कर लेगा. क्या यह सलाह उसी सीख की तर्ज़ पर नहीं है जो हमारे यहाँ लड़कियों को आम तौर पर बचपन से ही दी जाती है--जैसे शादी के बाद पति की हर इच्छा पूरी करो, वह चाहे कुछ भी कर ले, उफ़ तक न करो, उसीकी पसंद से पहनो-ओढ़ो, उसीकी पसंद का खाना पकाओ, उसकी कुछ बातें चाहें अच्छी न लगें, उन्हें नजरअंदाज कर जाओ, पतिव्रता बनी रहो--एक आदर्श पत्नी का यही धर्म है. 

और मज़े की बात तो यह है कि अपने आपको आधुनिक बतानेवाली, बम्बई जैसे महानगर से अँग्रेज़ी में प्रकाशित होनेवाली, उच्च और उच्च मध्यवर्गीय शिक्षित परिवारों में पढ़ी जानेवाली एक पत्रिका इस तरह की सामग्री परोस रही है. 

जहाँ यह पत्रिका यह मानकर चल रही है कि किशोरियों का बॉयफ्रेंड तो होना ही चाहिए, वहीं वह किशोरियों के मन में असुरक्षा की यह भावना भी पैदा कर रही है कि बॉयफ्रेंड को संभाल कर रखो वर्ना वह तुम्हें छोड़कर किसी और का हो जाएगा. 

यदि लड़कियों को पश्चिमी आधुनिकता से ही वाक़िफ़ कराना है तो उन्हें बताइए कि पश्चिमी लड़की का रवैया क्या होता है. पश्चिमी लड़की अपने निजत्व पर अपने बॉयफ्रेंड की पसंद को इतना हावी कभी भी नहीं होने देगी कि बस, बॉयफ्रेंड की रुचि के अनुसार ही सजे-धजे. इससे पहले कि उसका बॉयफ्रेंड उसे छोड़कर किसी और से दोस्ती कर ले, वह खुद ही बॉयफ्रेंड को छोड़ देगी. जहाँ पति-पत्नी का एक-दूसरे से सम्बन्ध-विच्छेद आम है, वहाँ बॉयफ्रेंड को छोड़ना कौनसी बड़ी बात है? ऐसा नहीं है कि रिश्तों की टूटन से उन्हें दुःख नहीं होता, लेकिन वहाँ इस तरह की बातों को ज़िंदगी का एक हिस्सा मानकर स्वीकार कर लिया गया है. 

लड़कियों को दब -झुक कर चलने की दक़ियानूसी सीख को आधुनिकता का चमचमाता मुलम्मा चढ़ाकर पेश करने की बजाय क्या यह अच्छा नहीं होगा कि लड़कियों को घर-परिवार और समाज में अपने अधिकारों के प्रति सजग किया जाए और बॉयफ्रेंड की चिंता छोड़ अपने लिए एक सच्चा मित्र तलाश करने की प्रेरणा दी जाए जो हो सकता है आगे जाकर जीवनसाथी बन जाए?